ऋषि अष्टावक्र ने कहा- जैसा सोचोगे वैसा ही होगा, ऐसा कैसे होता है संभव? जानें मनोविज्ञान

ऋषि अष्टावक्र ने कहा- जैसा सोचोगे वैसा ही होगा, ऐसा कैसे होता है संभव? जानें मनोविज्ञान

Power Of Thoughts: प्राचीन काल में एक ऋषि थे, जिनका नाम अष्टावक्र था. उन्होंने राजा जनक को जो उपदेश दिए, उसे अष्टावक्र गीता के नाम से जानते हैं. ऋषि अष्टावक्र ने कहा है कि आप जैसा सोचोगे, वैसा ही होगा. या​ फिर आप यह कह सकते हैं कि जैसी गति, वैसी ​मति. आधुनिक मनोविज्ञान भी कहता है कि आप जो अपने मस्तिष्क को संदेश देते हैं या कोई टारगेट देते हैं तो वह ठीक वैसे ही काम करने लगता है. आपकी सोच के अनुसार ही परिणाम मिलता है. बड़े ही आश्चर्य की बात हो सकती है कि आज का मनोविज्ञान जो शोध करके हमें बता रहा है, वो शास्त्रों और ग्रंथों में वर्षों पहले लिखा जा चुका है.

कौन थे ऋषि अष्टावक्र?

ऋषि अष्टावक्र को उनके पिता ने श्राप दिया था, जिसकी वजह से उनका शरीर 8 जगहों से टेढ़ा हो गया था. इस कारण यह था कि उनके पिता ऋषि कहोड़ वेदमंत्रों का पाठ कर रहे थे, तो उस दौरान अपनी माता के गर्भ में अष्टावक्र सभी बातें सुन रहे थे और पिता को टोका की आपके मत्रोच्चार में गलतियां हैं. इससे गुस्सा होकर पिता ने श्राप दे दिया.

अष्टावक्र बचपन से ही काफी तेज और विद्वान थे. उन्होंने 12 वर्ष की आयु में राजा जनक के दरबार में वंदी नामक प्रकांड विद्वान को शास्त्रार्थ में हराया. जिस वंदी ने उनके पिता को शास्त्रार्थ में हराकर जल-समाधि दिलाई थी, उनको अष्टावक्र वापस लेकर आए थे.

ऋषि अष्टावक्र ने राजा जनक को ज्ञानयोग और साक्षी भाव का ज्ञान दिया था, जिसे अष्टावक्र गीता या अष्टावक्र संहिता कहते हैं. यह अध्यात्म और दर्शन का महत्वपूर्ण ग्रंथ है.

ऋषि अष्टावक्र ने बताई विचारों की ताकत

ऋषि अष्टावक्र ने राजा जनक को बताया कि व्यक्ति जैसा सोचता है, मानता है, ठीक वैसा ही बन जाता है. अष्टावक्र गीता के अध्याय 1, श्लोक 11 के अनुसार, मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बुद्धाभिमान्यपि। किंवदन्ती सत्येव या मतिः सा गतिर्भवेत्॥

इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति स्वयं को मुक्त या स्वतंत्र मानता है तो वह स्वतंत्र हो जाता है. यदि आप स्वयं को बंधनों में जकड़ा हुआ मानते हो तो आप बंधनों में बंधे हुए रहोगे. बंधन और मोक्ष केवल व्यक्ति के सोच में है. व्यक्ति की जैसी सोच या मान्यता होती है, उस दिशा में ही उसका जीवन आगे बढ़ता है.

एक सोच बदल सकती है आपकी दुनिया

आधुनिक मनोविज्ञान भी कहता है कि मनुष्य का दिमाग सही या गलत नहीं समझता है, वह भावों को महसूस करता है. आप जो सोचते हो, जैसा सोचते हो, आपका दिमाग उसे वैसे ही प्रॉसेस करता है. अगर आप सफलता के बारे में सोचते हो तो वह आपके लिए वैसा काम करेगा, अगर आप असफलता के बारे में सोचते हो तो वह वैसे ही भाव आपके शरीर और मन में पैदा करेगा.

यह ठीक वैसे ही है कि आप किसी को यह न बताओ कि फला काम बहुत ही कठिन और जटिल है. जब आप किसी को कोई काम सौंपते हैं तो उसे पूरा करने को कहेंगे तो उसका दिमाग उसके समाधान के बारे में सोचता है. जब आप उस काम की जटिलत और असंभव जैसी बातों को बोलकर काम सौंपते हैं, तो उस व्यक्ति का दिमाग काम से ज्यादा असंभव और जटिलताओं पर ​केंद्रित हो जाता है. वह समाधान के बजाय आपके कहे शब्दों में उलझ जाता है.

दिमाग को जो विश्वास दिलाओगे, वैसा होगा!

मनोविज्ञान के अनुसार, जब आप किसी बात को मान लेते हैं कि वह ऐसा ही है, उस पर गहराई से विश्वास कर लेते हैं, तो आपका दिमाग और व्यवहार भी वैसे ही होने लगता है. आप किसी काम में सफल होने की उम्मीद करते हैं, तो दिमाग मानता है कि आपके लिए संभावनाएं हैं और वह आपके मनोबल को कई गुना अधिक बढ़ा देता है. ऐसी ही जब मन में कोई डर बैठ जाता है यानि आप अपने दिमाग को विश्वास दिलाते हैं कि उस काम में खतरा है, आप असफल हो जाएंगे तो आप देखेंगे कि अचानक से आपका मनोबल कम हो जाता है. आपका व्यवहार बदल जाता है, आप अनमने ढंग से प्रयास करते हैं. कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत.

सांइस की भाषा में समझें तो हर व्यक्ति के दिमाग में रेटिक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम नाम का फिल्टर होता है, जो किसी काम पर ध्यान केंद्रित करने कार्य करता है. जब आप सकारात्मक सोचते हैं तो वह अवसरों और संभावनाओं को तलाशता है, वहीं जब आप नकारात्मक सोचते हैं तो वह समस्याएं और कमियां पर ही आपका ध्यान कें​द्रित करता है.

सबका निचोड़ यह है कि आप किसी काम को करने से पहले ही अपने दिमाग में नकारात्मक अवधारणा न बनाएं, अपने दिमाग को यह विश्वास न दिलाएं कि आपके लिए वह असंभव या असफलता वाला है. आप अपने दिमाग को सकारात्मक रखकर काम करेंगे तो आपके लिए सफलता की संभावनाएं बढ़ जाएंगी. वैसे ही लोगों की मदद भी मिलेगी क्योंकि दिमाग सफलता पाने के लिए अवसरों की तलाश तेजी से करेगा.

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