Karthigai Deepam Festival: कार्तिगई दीपम क्यों है खास? जानें तिरुपरनकुंद्रम में महादीपम और मुरुगन भक्ति की अनोखी परंपरा

Karthigai Deepam Festival: कार्तिगई दीपम क्यों है खास? जानें तिरुपरनकुंद्रम में महादीपम और मुरुगन भक्ति की अनोखी परंपरा

Karthigai Deepam Festival: कार्तिगई दीपम तमिलनाडु का एक बेहद खास और प्राचीन त्योहार है, जिसे लेकर हर साल लाखों लोग उत्साहित रहते हैं. यह पर्व भगवान शिव और उनके पुत्र भगवान मुरुगन के सम्मान में मनाया जाता है. ज्योतिषीय दृष्टि से इसे तब मनाना शुभ माना जाता है जब चंद्रमा ‘कृत्तिका’ नक्षत्र में और तिथि पूर्णिमा हो. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने ब्रह्मा और विष्णु के सामने ‘ज्योति स्तंभ’ के रूप में प्रकट होकर अपनी दिव्य शक्ति दिखाई थी. वहीं, भगवान मुरुगन का जन्म भी छह दिव्य अग्निशिखाओं से हुआ था, जिन्हें ‘कृत्तिका’ नक्षत्र की देवियों ने पाला था. तमिलनाडु के मदुरै में स्थित तिरुपरनकुंद्रम मंदिर इस पर्व का केंद्र है. यहां हजारों श्रद्धालु हर साल कार्तिगई दीपम देखने और भगवान मुरुगन की पूजा करने आते हैं. यह केवल पूजा का अवसर नहीं बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम है. इस दिन पहाड़ी की चोटी पर विशाल ‘महादीपम’ जलाने की परंपरा है, जो शहर के हर कोने में खुशियों और प्रकाश का संदेश फैलाती है. इस त्योहार की रोचक बातें और पुरानी परंपराएं बताती हैं कि कार्तिगई दीपम सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि मन, आत्मा और समाज की शुद्धि का प्रतीक भी है.

कार्तिगई दीपम क्या है?
कार्तिगई दीपम का मूल केंद्र तिरुपरनकुंद्रम मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह पवित्र निवासों में पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है. यहां हर साल कार्तिगई दीपम का आयोजन बड़े धूमधाम से किया जाता है. यह त्योहार भगवान मुरुगन की जीत और जीवन में अच्छाई की विजय का प्रतीक है. धार्मिक कथाओं के अनुसार, भगवान मुरुगन ने असुरों पर विजय पाने के बाद देवयानी से विवाह किया था. इसी दिन मंदिर में भगवान शिव और मुरुगन दोनों की विशेष पूजा होती है. ऐसा माना जाता है कि शिव का प्रकट होना ‘अग्नि स्तंभ’ के रूप में हुआ था, जिसे ब्रह्मा और विष्णु भी देख नहीं सके. यह अग्नि अहंकार का विनाश और ज्ञान के उदय का प्रतीक है.

भगवान मुरुगन का जन्म और महत्व
पुराणों में वर्णित है कि भगवान मुरुगन का जन्म शिव के तीसरे नेत्र से निकली छह अग्नि चिनगारियों से हुआ था. इन छह स्वरूपों को ‘कृत्तिका’ नक्षत्र की छह देवियों ने पाला था. इसलिए, इस दिन भगवान मुरुगन की पूजा करने का मतलब उन्हें पालने वाली माताओं के प्रति सम्मान व्यक्त करना भी माना जाता है. ज्योतिष के अनुसार, इस दिन का समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा के संचार के लिए बेहद शक्तिशाली होता है. चंद्रमा कृत्तिका नक्षत्र में और सूर्य वृश्चिक राशि में होते हैं. इस समय की ऊर्जा दोषों को दूर करके मन और आत्मा को शुद्ध करती है.

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तिरुपरनकुंद्रम मंदिर में परंपरा
मंदिर की पहाड़ी पर विशाल तांबे के बर्तन में घी और कपूर डालकर ‘महादीपम’ जलाया जाता है. जैसे ही यह ज्योति जलती है, पूरे मदुरै शहर में उत्सव का माहौल फैल जाता है. लोग अपने घरों के बाहर मिट्टी के दीपक जलाते हैं. इस परंपरा का महत्व केवल रोशनी फैलाना नहीं है. इसे आकाश और पृथ्वी के मिलन का प्रतीक माना जाता है. दीप हमेशा ऊपर की ओर उठता है, जो बताता है कि मनुष्य का लक्ष्य भी उच्च आध्यात्मिक चेतना की ओर होना चाहिए. यह पर्व समाज में भाईचारे, शांति और नैतिक मूल्यों को भी मजबूत करता है.

विवाद और संरक्षण
हालांकि कार्तिगई दीपम की परंपरा अत्यंत प्राचीन है, लेकिन कुछ सालों से इसके आयोजन को लेकर स्थानीय समुदाय और प्रशासन के बीच विवाद भी सामने आया है. विवाद का कारण मुख्य रूप से सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ा है. इसके बावजूद, मंदिर प्रशासन ने उत्सव को सुरक्षित और परंपरा के अनुसार मनाने की व्यवस्था की है. यह दिखाता है कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर को बचाना और उसका सही तरीके से सम्मान करना कितना जरूरी है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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