Janmashtami Vrat Katha: आज जन्माष्टमी पूजा के समय पढ़ें श्रीकृष्ण जन्म कथा, व्रत का मिलेगा पूर्ण फल, इसके बिना अधूरा है उपवास

Janmashtami Vrat Katha: आज जन्माष्टमी पूजा के समय पढ़ें श्रीकृष्ण जन्म कथा, व्रत का मिलेगा पूर्ण फल, इसके बिना अधूरा है उपवास

आज 16 अगस्त शनिवार को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव पूरे देश में मनाया जा रहा है. इस अवसर पर लोग व्रत हैं और मध्य रात्रि में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव और पूजन होगा. पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्य रात्रि को बुधवार के दिन मथुरा के करागार में हुआ था. उस समय चंद्रमा वृषभ राशि में था. उनके पिता वासुदेव और माता देवकी थीं. इस वजह से हर साल भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि को जन्माष्टमी मनाई जाती है. इस साल जन्माष्टमी के लिए भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की उदयातिथि ली गई है. पंचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण अष्टमी ति​थि 15 अगस्त की रात 11:49 बजे से आज 16 अगस्त की रात 9:34 बजे तक है. जन्माष्टमी का जन्मोत्सव मुहूर्त आज देर रात 12:04 एएम से 12:47 एएम तक है. इस शुभ मुहूर्त में जब आप भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करें तो आपको जन्माष्टमी व्रत कथा जरूर पढ़नी चाहिए. इसके बिना जन्माष्टमी का व्रत अधूरा माना जाता है.

जन्माष्टमी व्रत कथा 2025

पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा पर राजा अग्रसेन का शासन था. उसका एक बेटा था, जिसका नाम कंस था. वह अत्याचारी था, उसके अपने पिता को राजसिंहासन से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन गया. कंस की एक बहन थीं, जिनका नाम देवकी था. उनका विवाह यदुवंशी वासुदेव से हुआ था.

एक बार की बात है, जब कंस अपनी बहन देवकी को उसके सुसराल छोड़ने जा रहा था. तभी रास्ते में आकाशवाणी हुई- हे कंस! जिस देवकी को तू उसके घर छोड़ने जा रहा है, उसी में तेरा काल बस रहा है. देवकी के गर्भ से उत्पन्न लेने वाला 8वां बालक ही तेरा वध करेगा. यह सुनकर कंस क्रोधित हो गया और वासुदेव को मारने के लिए आगे बढ़ा.

देवकी ने कंस को रोक लिया और कहा कि उनके गर्भ से जो भी संतान होगी, उसे तुम्हारे सामने ला दूंगी. पति वासुदेव को मारने से क्या लाभ होगा? कंस देवकी की बात मान गया और वापस म​थुरा लौट आया. उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में डाल दिया.

वासुदेव और देवकी से 7 बच्चे हुए, कंस ने जन्म लेते ही एक-एक करके सभी को मार डाला. जब देवकी को 8वां बच्चा होने वाला था, तो कंस डरा हुआ था, उसके कारागार के चारों ओर पहरा कड़ा कर दिया. उधर वृंदावन में नंद जी की पत्नी यशोदा भी गर्भ से थीं और उनको भी बच्चा होने वाला था.

यशोदा जी के गर्भ से एक कन्या ने जन्म लिया. वहीं जब देवकी जी का समय आया तो पहले भगवान विष्णु प्रकट हुए, दोनों ने उनको प्रणाम किया. भगवान विष्णु ने वासुदेव जी को बताया कि बालक के जन्म होते ही उसे वंदावन में नंद जी के घर भेज देना और वहां जन्मी कन्या को लेकर आना. उसके बाद देवकी जी ने एक सुंदर बालक को जन्म दिया.

बालक के जन्म लेते ही कारागार के सभी दरवाजे खुल गए. सभी सुरक्षाकर्मी गहरी नींद में सो गए. तक वासुदेव जी ने नवजात बालक श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागार से बाहर निकले और वृंदावन चल दिए. बीच रास्ते में यमुना जी ने उनको मार्ग दिया और वे नंद जी के घर पहुंच गए. वहां उन्होंने नवजात श्रीकृष्ण को यशोदा जी के पास सुला दिया और कन्या को लेकर वापस देवकी जी के पास आ गए.

सुबह होने पर कंस को सूचना मिली कि देवकी जी ने बच्चे को जन्म दिया है. वह कारागार में आया और देवकी जी के हाथ से उस नवजात बच्ची को छीनकर ले गया और उसे जमीन पर पटक कर मारना चाहा, तभी वह आसमान में उड़ गई. उसने कहा- हे मूर्ख! मुझे मारकर क्या करेगा? तुझे मारने वाला तो वृंदावन चला गया है. वह तुझे पापों का दंड देगा. उसके बाद वह कन्या गायब हो गई. कहा जाता है​ कि वह कन्या एक ‘माया’ थी. इस तरह से भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ.

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