मलमास, अधिकमास और पुरुषोत्तम मास, साल के 2 मास बदल देते हैं कैलेंडर, क्या है इसकी खासियत

मलमास, अधिकमास और पुरुषोत्तम मास, साल के 2 मास बदल देते हैं कैलेंडर, क्या है इसकी खासियत

Kharmas, Adhik Mas, Purushottam Mas: हर साल हमारे कैलेंडर में कुछ ऐसे समय आते हैं, जब पारंपरिक ज्योतिषीय दृष्टि से शुभ कार्य टालने की सलाह दी जाती है. इन दिनों को लोग ‘खरमास’ या ‘अधिकमास’ के नाम से जानते हैं. खरमास और अधिकमास दोनों ही हमारे जीवन में महत्वपूर्ण हैं. जबकि खरमास सूर्य की गति पर आधारित है और साल में दो बार आता है, अधिकमास चंद्र और सौर कैलेंडर के तालमेल के लिए लगभग हर तीन साल में एक बार आता है. पुरुषोत्तम मास के रूप में अधिकमास भक्ति और दान के लिए सर्वोत्तम माना जाता है. इस प्रकार, ये दोनों मास हमें न केवल धार्मिक महत्व याद दिलाते हैं, बल्कि जीवन में संयम और सोच समझ कर कर्म करने की प्रेरणा भी देते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि साल में ये दो बार क्यों आते हैं और इनके पीछे क्या रहस्य है? आज हम आपको सरल और रोचक अंदाज में बता रहे हैं कि खरमास, मलमास और पुरुषोत्तम मास की पौराणिक और ज्योतिषीय कहानी क्या है.

खरमास: जब सूर्य की चाल होती है धीमी
खरमास साल में दो बार आता है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब सूर्य धनु और मीन राशि में प्रवेश करता है, तब उसे खरमास कहते हैं. पहला खरमास आता है दिसंबर-जनवरी के बीच (धनु संक्रांति के समय) और दूसरा मार्च-अप्रैल में (मीन संक्रांति के समय).

सौर प्रभाव: ऐसा माना जाता है कि इन राशियों में सूर्य का प्रभाव थोड़ा कमजोर या मलिन हो जाता है. चूंकि सूर्य ऊर्जा, शक्ति और सौभाग्य का प्रतीक है, इसलिए इस समय विवाह, गृह प्रवेश, व्रत आदि मांगलिक कार्य टालने की सलाह दी जाती है.

पौराणिक कथा: प्राचीन कथाओं में बताया गया है कि सूर्य देव के रथ के घोड़े थक गए थे. तब उन्होंने गधों (खर) को रथ में जोड़ा, जिससे रथ की गति धीमी हो गई. इसी धीमी गति के कारण इसे ‘खरमास’ कहा गया.

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अधिकमास: जब कैलेंडर का तालमेल बिगड़ता है
अधिकमास या मलमास लगभग हर 3 साल में एक बार आता है. यह महीने का नाम कैलेंडर और चंद्रमा के बीच तालमेल सुधारने के लिए जोड़ा गया था. इसे पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है.

वैज्ञानिक वजह: एक सौर वर्ष 365 दिन का होता है और एक चंद्र वर्ष 354 दिन का. साल दर साल यह अंतर लगभग 10-11 दिन बढ़ता है. तीन साल में यह अंतर लगभग एक महीने के बराबर हो जाता है. इसे संतुलित करने के लिए एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहते हैं.

ज्योतिषीय महत्व: अधिकमास में कोई सूर्य संक्रांति नहीं होती, इसलिए पारंपरिक रूप से इसे मांगलिक कार्यों के लिए वर्जित माना गया. लेकिन भगवान विष्णु ने इसे पुरुषोत्तम मास का नाम देकर इसे भक्ति और दान के लिए सबसे उत्तम महीना घोषित किया.

व्यावहारिक उदाहरण: अगर कोई परिवार इस महीने में दान, पूजा या कथा आयोजन करता है, तो इसे अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है. यह मास व्यापारियों, किसानों और गृहस्थों के लिए भी मानसिक शांति और धार्मिक उत्साह लाता है.

खरमास और अधिकमास में अंतर

विशेषता                      खरमास                            अधिकमास (पुरुषोत्तम मास)

आवृत्ति                        साल में दो बार                   लगभग हर 3 साल में एक बार
आधार                        सूर्य की राशि परिवर्तन         चंद्र और सौर कैलेंडर का तालमेल
शुभ कार्य वर्जित           भक्ति, दान,                        पूजा के लिए उत्तम
पौराणिक कथा             सूर्य के रथ की धीमी गति      भगवान विष्णु का नामकरण

जीवन में इसका महत्व
खरमास और अधिकमास केवल ज्योतिषीय घटनाएं नहीं हैं. ये हमारे जीवन में ध्यान, संयम और धार्मिकता की याद दिलाते हैं. उदाहरण के तौर पर, व्यापारी इस समय बड़े निवेश को टालते हैं, परिवार अपने पारिवारिक व्रत और पूजा में समय बिताते हैं. कई लोग इस अवसर पर गरीबों और जरूरतमंदों को दान देकर पुण्य कमाते हैं.

ज्योतिषीय दृष्टि से सीख: ये मास हमें याद दिलाते हैं कि कभी-कभी जीवन में धीमे कदम, संयम और आत्मनिरीक्षण जरूरी होता है. सूर्य की गति धीमी हो या कैलेंडर में अतिरिक्त महीना आए, असली संदेश यही है कि समय और कर्म का संतुलन जीवन में महत्वपूर्ण है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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