Mahabharat Katha: दुर्योधन की चाल में फंसे पांडवों के मामा शल्य, लेकिन उनकी 1 शर्त ने युद्ध का रुख पलट दिया

Mahabharat Katha: दुर्योधन की चाल में फंसे पांडवों के मामा शल्य, लेकिन उनकी 1 शर्त ने युद्ध का रुख पलट दिया

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King Shalya In Mahabharat: राजा शल्य की यह शर्त कौरवों पर भारी पड़ी. युद्ध में अधर्म का साथ देने वालों को अंततः हार का सामना करना पड़ा. शल्य ने दुर्योधन को दिया वचन तो निभाया, लेकिन उनकी वाणी ने कौरवों की हार म…और पढ़ें

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दुर्योधन की चाल में फंसे पांडवों के मामा शल्य, 1 शर्त ने युद्ध का रुख पलट दियामहाभारत की कहानी
King Shalya In MahaBharat: महाभारत का युद्ध इतिहास की सबसे बड़ी घटनाओं में से एक माना जाता है. इसमें कई ऐसे मोड़ आए जिनसे युद्ध का रुख बदल गया. कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडव एक-दूसरे के आमने-सामने थे. कौरवों की सेना में कई महान योद्धा और महारथी थे, फिर भी वे जीत नहीं पाए. इन्हीं योद्धाओं में पांडवों के सगे मामा भी शामिल हुए थे. यह सुनकर हैरानी होती है कि जो अपने भांजों के इतने करीब थे, वे उनके खिलाफ कौरवों के साथ क्यों खड़े हुए? इसके पीछे दुर्योधन की एक चाल थी और एक वचन, जिसे निभाने के लिए पांडवों के मामा को कौरवों का साथ देना पड़ा, लेकिन राजा शल्य की एक शर्त कौरवों पर भारी पड़ गई. आइए जानते हैं यह पूरी कहानी. भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से.

कौन थे पांडवों के मामा?
महाभारत की यह घटना उस समय की है, जब युद्ध की तैयारियां चल रही थीं. कौरव और पांडव दोनों ही पक्ष बड़े-बड़े योद्धाओं को अपनी ओर करने में लगे थे. उसी दौरान दुर्योधन ने पांडवों के मामा मद्र नरेश शल्य को अपने पक्ष में लाने के लिए चाल चली. शल्य राजा पांडु की दूसरी पत्नी माद्री के भाई थे. यानी वे नकुल और सहदेव के सगे मामा और युधिष्ठिर, भीम व अर्जुन के भी मामा हुए.

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दुर्योधन ने किया शल्य से छल
पांडव और कौरव युद्ध की घोषणा हो चुकी थी. शल्य राजा अपने भांजों से मिलने के लिए अपनी सेना के साथ हस्तिनापुर जा रहे थे. दुर्योधन को इस बात का पता चल गया. उसने रास्ते में सभी जगह शल्य और उनकी सेना के लिए रहने और खाने-पीने की शानदार व्यवस्था कर दी. शल्य को लगा कि यह सब युधिष्ठिर के आदेश पर हो रहा है. वे बहुत खुश हुए और यह जानना चाहा कि इतनी बेहतरीन व्यवस्था किसने की है, ताकि वे उन्हें पुरस्कार दे सकें. तभी दुर्योधन सामने आ गया और बोला कि यह सब व्यवस्था उसी ने कराई है. शल्य राजा कृतज्ञ हो गए और बोले कि आज तुम जो भी मांगोगे, वह मिलेगा.

वचन में बंध गए शल्य राजा
दुर्योधन इसी मौके का इंतजार कर रहा था. उसने कहा कि वह चाहता है कि शल्य युद्ध में कौरवों का साथ दें और सेना का संचालन करें. शल्य राजा अपने वचन से पीछे नहीं हट सकते थे. इसलिए उन्होंने दुर्योधन का प्रस्ताव मान लिया और कौरवों की ओर से रहने का निर्णय ले लिया.

शल्य ने रखी अपनी शर्त
शल्य राजा ने दुर्योधन का प्रस्ताव तो मान लिया, लेकिन उन्होंने भी एक शर्त रख दी. उन्होंने कहा कि वे कौरवों की ओर से रहेंगे और आदेश का पालन करेंगे, लेकिन युद्ध के दौरान उनकी वाणी पर सिर्फ उनका अधिकार होगा. दुर्योधन को लगा कि इस शर्त से उसे कोई नुकसान नहीं होगा, इसलिए उसने तुरंत इसे मान लिया.

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शर्त कैसे पड़ी कौरवों पर भारी?
जब युद्ध शुरू हुआ तो शल्य को कर्ण का सारथी बना दिया गया. वे कर्ण का रथ चलाते थे, लेकिन उन्होंने अपनी शर्त के अनुसार हर समय कौरवों को हतोत्साहित करने का काम किया. वे बार-बार पांडवों की वीरता का बखान करते, कर्ण और बाकी योद्धाओं को उनकी कमजोरियां बताते और उनका मनोबल गिराने का काम करते.
कर्ण को वे अर्जुन की ताकत और वीरता की कहानियां सुनाते रहते थे ताकि उसका आत्मविश्वास कमजोर हो जाए. शल्य का यह रवैया कौरवों के लिए बहुत नुकसानदेह साबित हुआ. वे बाहर से तो कौरवों का साथ दे रहे थे, लेकिन अपनी वाणी से पांडवों का मनोबल बढ़ा रहे थे.

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