Lolark chhath 2025: काशी के इस कुंड में डुबकी लगाने से भर जाती है सूनी गोद! जानिए किस देव की होती पूजा और महत्व

Lolark chhath 2025: काशी के इस कुंड में डुबकी लगाने से भर जाती है सूनी गोद! जानिए किस देव की होती पूजा और महत्व

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Lolark Chhath पर काशी के लोलार्क कुंड में स्नान और लोलार्केश्वर महादेव की पूजा से संतान प्राप्ति व शारीरिक कष्टों से मुक्ति की मान्यता है, लाखों दंपति यहां आते हैं.

Lolark chhath 2025: काशी के इस कुंड में डुबकी लगाने से भर जाती है सूनी गोद!लोलार्क षष्ठी पर इस कुंड में स्नान करने से भर जाएगी सूनी गोद! (AI)
Lolark Chhath 2025: हिन्दू धर्म में व्रत-पूजन और तिथियों का विशेष महत्व है. आज यानी 29 अगस्त को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि है. इस दिन लोलार्क छठ का महापर्व मनाया जाता है. इस पर्व का नाम लोलार्क कुंड पर रखा गया है. यह कुंड बनारस के काशी में स्थित है. इसलिए यह त्योहार बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में बेहद शिद्दत से मनाया जाता है. इस दिन भगवान सूर्य की उपासना और महादेव की पूजा का विधान है. धार्मिक मान्यता है कि, काशी के भदैनी मोहल्ले में स्थिति लोलार्क कुंड में डुबकी लगाने से निसंतान दंपत्तियों की सूनी गोद भर जाती है. इसलिए संतान प्राप्ति की मन्नत को लेकर देशभर से लाखों दंपति स्नान के लिए आते हैं. अब सवाल है कि आखिर लोलार्क षष्ठी पर किस देवता की पूजा होती है? लोलार्क षष्ठी पर कुंड में स्नान करने से क्या होगा? लोलार्क षष्ठी की पौराणिक मान्यताएं क्या हैं? जानिए इसका महत्व-

लोलार्क षष्ठी के दिन स्नान की मान्यता

ऐसी मान्यता है कि इस तिथि पर दर्शन मात्र से महादेव दंपतियों को अभीष्ट वरदान देते हैं. इस दिन स्नान के लिए यहां सुबह से ही लाइन लग जाती है. मान्यता है कि, लोलार्क षष्ठी के दिन कुंड में स्नान और लोलार्केश्वर महादेव की पूजा से संतान की प्राप्ति होती है. साथ ही, सभी शारीरिक कष्टों से मुक्ति मिलती है. यह भी कहा जाता है कि जो मनुष्य असीसंगम में स्नान करके देवताओं ओर पितरों का तर्पण एवं विधिपूर्वक श्राद्ध करें तो वह पितरो के ऋण से छूट जाता है. जो मनुष्य रविवार को लोलार्क का दर्शन करके उनका चरणामृत लेता है, उसे कोई दुःख नहीं होता ओर खुजली, दाद तथा फोड़ा-फंसी का कष्ट भी नहीं भोगना पड़ता.

क्या है लोलार्क पष्ठी की पौराणिक कथा

काशी खंड, शिव पुराण, विष्णु पुराण समेत कई सनातनी धर्मग्रंथों में इसका उल्लेख है. मान्यता यह भी है कि मानवों के बीच जीवन शक्ति और पवित्रता का विस्तार करने के लिए महादेव ने सूर्यदेवता को अपने दूत के रूप में काशी भेजा था. स्कंद पुराण में लोलार्क कुण्ड की महिमा बताई गई है, जिसमें लिखा है कि अर्क अर्थात्‌ भगवान्‌ सूर्यका मन काशी के दर्शनके लिए लोल (चंचल) हो उठा था, इसलिए काशी में उनकी लोलार्कं नाम से ख्याति हुई . ऐसी मान्यता है कि सदियों पहले यहां एक बड़ा उल्कापिंड गिरा था, जिससे इस कुंड का निर्माण हुआ.

कुंड में स्नान के बाद एक फल का किया जाता त्याग

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आपको बता दें कि कहते हैं सूर्य भगवान की पूजा और लोलार्क कुंड में स्नान के बाद एक फल या सब्जी का दान करना चाहिए. इसके बाद उस सब्जी या फल का सेवन नहीं करना चाहिए. जो लोग मनोकामना मांगते हैं, उन्हें मनोकामना पूर्ति तक उसे उसका सेवन नहीं करना चाहिए. लोग यहां अपने कपड़े भी छोड़कर जाते हैं.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य जानकारियों पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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