Khichdi Mela 2026: गुरु गोरखनाथ की वजह से आज भी ज्वालादेवी मंदिर में उबल रहा पानी, मकर संक्रांति पर लगता है खिचड़ी मेला

Khichdi Mela 2026: गुरु गोरखनाथ की वजह से आज भी ज्वालादेवी मंदिर में उबल रहा पानी, मकर संक्रांति पर लगता है खिचड़ी मेला

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khichdi Mela 2026 Gorakhnath Temple: मकर संक्रांति के दिन गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी मेला का आयोजन किया जाता है और इस मेले में शामिल होने के लिए देश-विदेश से लाखों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं. बताया जाता है कि इस मंदिर में मंकर संक्रांति के दिन खिचड़ी अर्पित करने से सभी भक्तों की इच्छा पूरी हो जाती हैं. गोरखनाथ मंदिर का खिचड़ी मेला श्रद्धा, मनोरंजन और रोजगार का संगम है…

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Khichdi Mela 2026 Gorakhnath Temple: मकर संक्रांति पर गोरखनाथ मंदिर में लगने वाला खिचड़ी मेला श्रद्धा, मनोरंजन और रोजगार का संगम है. पूरी प्रकृति को ऊर्जस्वित करने वाले सूर्यदेव के उत्तरायण होने पर महायोगी गुरु गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने की अनूठी परंपरा पूरी तरह लोक को समर्पित है. गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी के रूप में चढ़ाया जाने वाला अन्न वर्षभर जरूरतमंदों में वितरित किया जाता है. मंदिर के अन्न क्षेत्र में कभी भी कोई जरूरतमंद पहुंचा है तो खाली हाथ नहीं लौटा. ठीक वैसे ही, जैसे बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाकर मन्नत मांगने वाला कभी निराश नहीं होता. मंदिर में खिचड़ी का यह पर्व इस वर्ष 15 जनवरी को मनेगा.

त्रेतायुग से खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा
गोरखनाथ मंदिर में खिचड़ी चढ़ाने की परंपरा त्रेतायुगीन मानी जाती है. मान्यता है कि तत्समय आदियोगी गुरु गोरखनाथ एक बार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी के दरबार में पहुंचे, जहां मां ने उनके भोजन का प्रबंध किया. कई प्रकार के व्यंजन देख बाबा ने कहा कि वह तो योगी हैं और भिक्षा में प्राप्त चीजों को ही भोजन रूप में ग्रहण करते हैं. उन्होंने मां ज्वाला देवी से पानी गर्म करने का अनुरोध किया और स्वयं भिक्षाटन को निकल गए.

इसलिए आज भी उबल रहा है ज्वाला देवी का पानी
भिक्षा मांगते हुए गुरु गोरखनाथ गोरखपुर आ पहुंचे और राप्ती और रोहिन के तट पर जंगलों में बसे इस स्थान पर धूनी रमाकर साधनालीन हो गए. उनका तेज देख लोग उनके खप्पर में अन्न (चावल, दाल) दान करते रहे. मकर संक्रांति का पर्व आने पर यह परंपरा खिचड़ी पर्व के रूप में परिवर्तित हो गई. तब से बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाने का क्रम हर मकर संक्रांति पर अहर्निश जारी है. कहा जाता है कि उधर ज्वाला देवी के दरबार में बाबा की खिचड़ी पकाने के लिए आज भी पानी उबल रहा है.

नेपाल से लाखों की संख्या में आते हैं भक्त
मकर संक्रांति के पावन पर्व पर गोरक्षपीठाधीश्वर नाथ पंथ की विशिष्ट परंपरानुसार गुरु गोरखनाथ को लोक आस्था की खिचड़ी चढ़ाकर समूचे जनमानस की सुख समृद्धि की मंगलकामना करते हैं. उत्तर प्रदेश, बिहार तथा देश के विभिन्न भागों के साथ-साथ पड़ोसी राष्ट्र नेपाल से भी लाखों की तादाद में श्रद्धालु शिवावतारी बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी चढ़ाते हैं. मकर संक्रांति के दिन भोर में सबसे पहले गोरक्षपीठ की तरफ से पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ खिचड़ी चढ़ाकर बाबा को भोग अर्पित करते हैं.

नेपाल के राजपरिवार से आती है खिचड़ी
तत्पश्चात नेपाल राजपरिवार की ओर से आई खिचड़ी बाबा को चढ़ाई जाती है. इसके बाद मंदिर के कपाट खोल दिए जाते हैं और जनसामान्य की आस्था खिचड़ी के रूप में निवेदित होनी शुरू हो जाती है. खिचड़ी महापर्व को लेकर मंदिर व मेला परिसर सज धजकर तैयार है. प्रशासन के साथ ही मंदिर प्रबंधन की तरफ से श्रद्धालुओं के ठहरने और अन्य सुविधाओं के पूरे इंतजाम किए गए हैं. गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद भी अब तक तीन बार खिचड़ी मेला की तैयारियों की समीक्षा कर चुके हैं.

मंदिर में बिना भेदभाव सबकी रोजी-रोटी का इंतजाम
गोरखनाथ मंदिर सामाजिक समरसता का ऐसा केंद्र है, जहां जाति, पंथ और मजहब की बेड़ियां टूटती नजर आती हैं. इसके परिसर में क्या हिंदू, क्या मुसलमान, सबकी दुकानें हैं. यानी बिना भेदभाव सबकी रोजी-रोटी का इंतजाम है. यही नहीं, मंदिर परिसर में लगने वाला खिचड़ी मेला भी जाति-धर्म के बंटवारे से इतर हजारों लोगों की आजीविका का माध्यम बनता है. मंदिर परिसर में नियमित रोजगार करने वालों से लेकर मेले में दुकान लगाने वालों तक, बड़ी भागीदारी अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की होती है. उन्होंने कभी कोई भेदभाव महसूस नहीं किया, बल्कि अपनेपन के भाव से विभोर होते रहते हैं. मेले में खरीदारी से लेकर मनोरंजन के साधनों तक के भरपूर इंतजाम हैं.

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Parag Sharma

पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें

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गुरु गोरखनाथ की वजह से आज भी ज्वालादेवी मंदिर में उबल रहा पानी, जानें महत्व



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