श्रीहरि के बाद अब महादेव चले शयन की ओर, रुद्रदेव राष्ट्रपति शासन की तरह करेंगे इतने
भगवान विष्णु के बाद अब महादेव चले शयन की ओर, रुद्रदेव संभालेंगे सृष्टि का शासन
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Shiv Shayanotsava 2026: गुरु पूर्णिमा से महादेव शयन की ओर अग्रसर हो रहे हैं. श्रीहरि के बाद अब भगवान शिव भी विश्राम करेंगे. इस दौरान रुद्रदेव राष्ट्रपति शासन की तरह इतने दिनों तक राज करेंगे. यह अवधि धार्मिक महत्व रखती है, जिसमें विशेष पूजा-अर्चना और अनुष्ठान किए जाएंगे. भक्तगण इस समय का उपयोग आत्मचिंतन और आध्यात्मिक साधना के लिए करेंगे.
Shiv Shayanotsava 2026: आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि का दिन केवल गुरु पूर्णिमा और व्यास पूजा के लिए ही नहीं, बल्कि शिव शयनोत्सव के कारण भी विशेष धार्मिक महत्व रखता है. इस बार 29 जुलाई दिन बुधवार को शिव शयनोत्सव का पर्व मनाया जाएगा. सनातन परंपरा के अनुसार, देवशयनी एकादशी पर भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं, इसके बाद गुरु पूर्णिमा के दिन से महादेव शिव शयन की ओर चले जाते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में भगवान शिव समाधि स्वरूप विश्राम करते हैं और सृष्टि के संरक्षण एवं व्यवस्था का दायित्व उनके रौद्र स्वरूप रुद्रदेव द्वारा निभाया जाता है. शास्त्रों में बताया गया है कि रुद्र का शासन राष्ट्रपति शासन की तरह होता है, उनकी हर छोटी-बड़ी चीज पर नजर रहती है और तुरंत फल प्रदान करते हैं.
भगवान शिव की होती है विशेष पूजा – धर्मग्रंथों में वर्णित परंपरा के अनुसार शिव शयनोत्सव का आयोजन कई प्राचीन शिव मंदिरों और मठों में विशेष विधि-विधान से किया जाता है. इस अवसर पर भगवान शिव का रुद्राभिषेक, विशेष श्रृंगार, शयन आरती और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है. श्रद्धालु भगवान शिव को चंदन, भांग, बेलपत्र, धतूरा, पुष्प और फल अर्पित कर सुख, शांति तथा आरोग्य की कामना करते हैं. कई शैव परंपराओं में माना जाता है कि इस काल में भगवान शिव समाधिस्थ रहते हैं और उनके रौद्र एवं जागृत स्वरूप रुद्रदेव धर्म की रक्षा तथा सृष्टि की व्यवस्था का दायित्व संभालते हैं.
राष्ट्रपति शासन की तरह होता है रुद्रदेव का शासन – शिव शयनोत्सव के बाद से ही रुद्रदेव का साम्राज्य शुरू हो जाता है और देवउठनी एकादशी के दिन तक चलता है. इसके बाद से फिर से भगवान विष्णु के पास सृष्टि के कार्यभार की जिम्मेदारी आ जाती है. चातुर्मास में रुद्रदेव सृष्टि के कर्ता और भर्ता का दायित्व संभालते हैं और उनका शासन एक राष्ट्रपति शासन की तरह होता है. इसलिए चातुर्मास में नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है क्योंकि हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी चीज पर रुद्रदेव की नजर होता है. इसलिए चातुर्मास में रुद्रदेव की पूजा अर्चना करने से ग्रह-नक्षत्र के दुष्प्रभाव दूर होते हैं और सभी परेशानियों से राहत मिलती है.
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वेदों व पुराणों में बताई गई रुद्रदेव की महिमा – ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अनेक पुराणों में रुद्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है. ऋग्वेद में रुद्रदेव की स्तुति बलवानों में सबसे अधिक बलवान कहकर की गई है. ऋग्वेद में रुद्र को तेजस्वी, पराक्रमी, रोगों का नाश करने वाले, औषधियों के स्वामी तथा समस्त प्राणियों के रक्षक के रूप में वर्णित किया गया है. उनसे प्रार्थना की गई है कि वे अपने उग्र स्वरूप को शांत कर भक्तों को स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख प्रदान करें. यजुर्वेद के श्रीरुद्रम (नमकम-चमकम) में रुद्र को समस्त सृष्टि में व्याप्त परम दिव्य शक्ति कहा गया है. वहां रुद्र को पर्वतों, नदियों, वनस्पतियों, पशुओं, दिशाओं और प्रत्येक जीव में विद्यमान बताया गया है. वे संहारक होने के साथ-साथ कल्याणकारी और मंगलकारी भी हैं, इसलिए उन्हें शिव कहा जाता है.
गुरु पूर्णिमा पर शिव शयनोत्सव शिव पुराण, लिंग पुराण, वायु पुराण तथा स्कंद पुराण में रुद्र को भगवान शिव का उग्र, शक्तिशाली और धर्मरक्षक स्वरूप बताया गया है. पुराणों के अनुसार जब अधर्म बढ़ता है और दुष्ट शक्तियों का प्रभाव फैलता है, तब रुद्र लोककल्याण, धर्म की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए सक्रिय होते हैं. अनेक पुराणों में एकादश रुद्रों का भी वर्णन मिलता है, जिन्हें भगवान शिव की विभिन्न शक्तियों का प्रतीक माना गया है.
धर्माचार्यों का कहना है कि शिव शयनोत्सव पर भगवान शिव की आराधना, महामृत्युंजय मंत्र का जाप, रुद्राभिषेक, गुरु पूजन और दान-पुण्य करने से साधक को आध्यात्मिक उन्नति, मानसिक शांति तथा भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है. यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा का यह दिन ज्ञान, तप, भक्ति और शिव आराधना का अद्भुत संगम माना जाता है.


