1857 में यहीं सैनिकों ने खाई थी आजादी की कसम! झांसी के इस गणेश मंदिर से जुड़ा रानी लक्ष्मी

1857 में यहीं सैनिकों ने खाई थी आजादी की कसम! झांसी के इस गणेश मंदिर से जुड़ा रानी लक्ष्मी

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रानी लक्ष्मीबाई इस मंदिर में करती थीं पूजा, 1857 में यही कसम खाते थे सैनिक

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Jhansi Ancient Ganesha Temple: भगवान गणेश के आपने कई मंदिरों के दर्शन किए होंगे लेकिन आज हम आपको गणेशजी एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसका सीधा संबंध रानी लक्ष्मीबाई से है. झांसी में स्थिति प्राचीन गणेश मंदिर में हर रोज रानी लक्ष्मीबाई दर्शन करने आती थीं और यहीं पर उनका विवाह भी हुआ था. साथ ही प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में भी इस मंदिर की खास भूमिका रही. आइए जानते हैं गणेशजी के इस मंदिर के बारे में…

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Jhansi Ancient Ganesha Temple: झांसी के ऐतिहासिक शहर में जहां हर दीवार और हर पत्थर पर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी की कहानियां गूंजती हैं, वहां ठीक झांसी किले के प्रवेश द्वार पर स्थित है विघ्नहर्ता भगवान गणेश का एक अद्भुत प्राचीन मंदिर. यह मंदिर ना सिर्फ अपनी अनोखी वास्तुकला और भक्ति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपनी उस ऐतिहासिक गाथा के लिए भी जाना जाता है. यह प्राचीन गणेश मंदिर ना सिर्फ धार्मिक महत्व रखता है बल्कि झांसी की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का भी अहम हिस्सा है. बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आकर विघ्न विनाशक भगवान गणेश से आशीर्वाद लेते हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने मात्र से सभी परेशानियां और कार्यों में चल रहे विघ्न दूर हो जाते हैं और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है. आइए जानते हैं झांसी के प्रसिद्ध गणेशजी के मंदिर के बारे में…

रानी लक्ष्मीबाई करती थीं रोजाना दर्शन
श्री गणेश के इस प्राचीन मंदिर में वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई रोजाना दर्शन-पूजन करती थीं. मंदिर की बनावट में एक खास गुंबद जैसा ढांचा है, जो प्राचीन वास्तुकला की शानदार कारीगरी का नमूना है. मंदिर के अंदर भगवान गणेश की संगमरमर की सुंदर मूर्ति स्थापित है, जिसका दिव्य चेहरा दमकता है.

इसी मंदिर में हुआ था विवाह
साल 1842 में राजा गंगाधर राव और मणिकर्णिका तांबे (जिन्हें बाद में रानी लक्ष्मीबाई नाम दिया गया) का विवाह इसी मंदिर में हुआ था. पवित्र रीतियों और अनुष्ठानों के बीच मणिकर्णिका को ‘रानी लक्ष्मीबाई’ का नाम मिला. किंवदंती है कि रानी लक्ष्मीबाई नियमित रूप से इस मंदिर में आकर भगवान गणेश की पूजा करती थीं और उनसे शक्ति व मन की शांति प्राप्त करती थीं.

पुरानी पीढ़ियों की अटूट आस्था
मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहास में थोड़ा रहस्य बना हुआ है. माना जाता है कि यह मंदिर 1760 ईस्वी के आसपास बनाया गया था. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि मराठा पेशवाओं के अधीन झांसी के सूबेदार विश्वास राव लक्ष्मण ने इसका निर्माण करवाया, जबकि कुछ अन्य का कहना है कि रघुनाथ राव नेवलकर, जो नेवलकर राजवंश के संस्थापक थे, उन्होंने इसकी नींव रखी. हालांकि, एक बात निश्चित है कि यह मंदिर आज भी पुरानी पीढ़ियों की अटूट आस्था और श्रद्धा का प्रतीक बना हुआ है.

गणेश मंदिर की सबसे बड़ी खासियत
गणेश मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां गणेश चतुर्थी का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जाता है. स्थानीय लोग आज भी अपने घर में गणेश प्रतिमा लाने से पहले इस मंदिर में पूजा करते हैं. रानी लक्ष्मीबाई के समय से भी पहले से यह परंपरा चली आ रही है. यह मंदिर केवल आस्था और श्रद्धा का केंद्र नहीं था, बल्कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रणनीतिक तैयारी का मुख्य आधार था. युद्ध के मैदान में कूच करने से पहले पूरी सेना यहां आकर भगवान गणेश के दर्शन करती और राष्ट्र रक्षा की शपथ भी लेती थी.

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Parag SharmaChief Sub Editor

पराग शर्मा Hindi News18 Digital में Chief Sub Editor के पद पर कार्यरत हैं. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, ग्रह-नक्षत्र, राशि और वास्तु से जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेद…और पढ़ें



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