अधूरी परिक्रमा भी क्यों मानी जाती है पूर्ण? जानें गणेश, विष्णु और सूर्य देव की परिक्रमा के

अधूरी परिक्रमा भी क्यों मानी जाती है पूर्ण? जानें गणेश, विष्णु और सूर्य देव की परिक्रमा के

Parikrama Rules: मंदिर में जाते ही कई लोग हाथ जोड़कर दर्शन करते हैं और फिर श्रद्धा से भगवान की परिक्रमा लगाते हैं. यह दृश्य लगभग हर तीर्थ और देवस्थान पर दिखाई देता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि परिक्रमा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आस्था, ऊर्जा और अनुशासन से जुड़ी एक गहरी आध्यात्मिक प्रक्रिया मानी जाती है. सनातन धर्म में परिक्रमा का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति भगवान, मंदिर, पीपल वृक्ष या पवित्र स्थान की परिक्रमा करता है तो वह अपनी चेतना को ईश्वर के केंद्र के चारों ओर स्थापित करता है. यही कारण है कि पूजा-पाठ में परिक्रमा को विशेष स्थान दिया गया है. हालांकि अलग-अलग देवी-देवताओं के लिए परिक्रमा के नियम भी अलग बताए गए हैं, जिनका पालन करना जरूरी माना जाता है.

परिक्रमा का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
सनातन परंपरा में परिक्रमा को समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक माना गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार जब भक्त भगवान की परिक्रमा करता है तो वह यह स्वीकार करता है कि उसके जीवन का केंद्र ईश्वर हैं. यही वजह है कि मंदिरों में दर्शन के बाद परिक्रमा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है. धर्मग्रंथों में यह भी कहा गया है कि परिक्रमा करने से मन शांत होता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है. कई लोग इसे ध्यान और साधना का हिस्सा भी मानते हैं. खास बात यह है कि ग्रामीण भारत में आज भी लोग पीपल, तुलसी और गौशाला की परिक्रमा को दैनिक पूजा का हिस्सा मानते हैं.

नंगे पैर करना शुभ
यदि संभव हो तो परिक्रमा नंगे पैर करनी चाहिए. ऐसा माना जाता है कि इससे धरती की सकारात्मक ऊर्जा सीधे शरीर तक पहुंचती है.

अधूरी परिक्रमा होने पर क्या करें
कई बार भीड़, स्वास्थ्य या स्थान की कमी के कारण पूरी परिक्रमा संभव नहीं हो पाती. ऐसे में धार्मिक मान्यता कहती है कि व्यक्ति अपने स्थान पर खड़े होकर श्रद्धा से चारों दिशाओं में घूम जाए तो भी उसे परिक्रमा का पुण्यफल प्राप्त हो सकता है.

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किस देवी-देवता की कितनी बार करनी चाहिए परिक्रमा

भगवान गणेश
प्रथम पूज्य भगवान गणेश की तीन बार परिक्रमा करना शुभ माना जाता है. मान्यता है कि इससे बुद्धि, सफलता और विघ्नों से मुक्ति मिलती है.

भगवान विष्णु, राम और कृष्ण
भगवान विष्णु की चार बार परिक्रमा करने का विधान बताया गया है. चूंकि भगवान राम और श्रीकृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाता है, इसलिए उनकी भी चार परिक्रमा की जाती है.

सूर्य देव
प्रत्यक्ष देवता माने जाने वाले सूर्य भगवान की सात बार परिक्रमा शुभ मानी जाती है. कई श्रद्धालु रविवार के दिन यह नियम विशेष रूप से निभाते हैं.

भगवान शिव
महादेव की पूजा में सबसे अलग नियम देखने को मिलता है. शिवलिंग की पूरी परिक्रमा नहीं की जाती. भक्त आधी परिक्रमा करके वापस लौट आते हैं और जलहरी को पार नहीं करते.

मां दुर्गा और हनुमान जी
देवी दुर्गा की एक परिक्रमा पर्याप्त मानी गई है, जबकि हनुमान जी की तीन बार परिक्रमा करना शुभ माना जाता है.

पीपल और यज्ञ कुंड की परिक्रमा का महत्व
धार्मिक मान्यताओं में पीपल के वृक्ष को देवतुल्य माना गया है. इसकी हमेशा विषम संख्या यानी 1, 3, 5, 7 या 11 बार परिक्रमा की जाती है. कई श्रद्धालु विशेष अवसरों पर 108 परिक्रमा भी करते हैं. वहीं किसी यज्ञ कुंड की तीन बार परिक्रमा करना शुभ माना गया है. विवाह संस्कार में अग्नि के फेरे इसी परंपरा का हिस्सा हैं.

परिक्रमा करते समय किन नियमों का रखें ध्यान

हमेशा दाईं ओर रहें भगवान
परिक्रमा करते समय भगवान या मंदिर हमेशा दाईं तरफ होना चाहिए. इसका अर्थ है कि परिक्रमा हमेशा घड़ी की दिशा में करनी चाहिए. उल्टी दिशा में परिक्रमा करना अशुभ माना गया है.

शांत मन और श्रद्धा जरूरी
धार्मिक मान्यता है कि परिक्रमा के दौरान मन शांत और विचार सकारात्मक होने चाहिए. कई लोग मंत्र जाप करते हुए परिक्रमा करते हैं, जिससे मन एकाग्र रहता है.

बातचीत से बचें
मंदिरों में अक्सर देखा जाता है कि लोग परिक्रमा करते समय बातचीत या मोबाइल में व्यस्त रहते हैं, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसे उचित नहीं माना जाता. परिक्रमा को ध्यान और भक्ति का समय माना गया है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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