Chaitra Navratri 2026: मां दुर्गा की सवारी सिंह है या बाघ? अलग अलग तस्वीरों में अलग-अलग वा

Chaitra Navratri 2026: मां दुर्गा की सवारी सिंह है या बाघ? अलग अलग तस्वीरों में अलग-अलग वा

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मां दुर्गा की सवारी सिंह है या बाघ? कैसे ममतामयी माता कहलाई गईं शेरावाली

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Chaitra Navratri 2026: शक्ति और विजय की प्रतीक मां दुर्गा की सवारी को लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर उनकी सवारी सिंह है या बाघ. अलग-अलग चित्रों और मूर्तियों में देवी को कभी सिंह पर तो कभी बाघ पर विराजमान दिखाया जाता है. इस विषय के पीछे धार्मिक मान्यताओं, शास्त्रों और क्षेत्रीय परंपराओं से जुड़ा एक रोचक रहस्य छिपा हुआ है. आइए जानते हैं मां दुर्गा की सवारी सिंह है या बाघ.

Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि का पर्व चल रहा है और इन नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग अलग स्वरूप की पूजा अर्चना की जाती है. माता का हर स्वरूप बेहद खास होता है और उस स्वरूप की अपनी कथा भी है. जितनी खास हमारी ममतामयी मां हैं, उतना ही खास उनका वाहन. माता के जयकारों में आपने सुना होगा कि बोलो शेरावाली माता की जय. लेकिन कई फोटो में आपने देखा होगा कि कभी माता को सिंह यानी शेर पर विराजमान रहती हैं तो कभी बाघ पर. तो ऐसे में सवाल उठता है कि शक्ति, साहस और विजय की प्रतीक माता दुर्गा की सवारी को लेकर सवारी सिंह है या बाघ. इस विषय के पीछे धार्मिक मान्यताओं, शास्त्रों और क्षेत्रीय परंपराओं से जुड़ा एक रोचक रहस्य छिपा हुआ है. आइए जानते हैं मां दुर्गा की सवारी सिंह है या बाघ.

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माता दुर्गा की मूल सवारी सिंह – धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, माता दुर्गा की मूल सवारी सिंह मानी जाती है. मार्कंडेय पुराण में वर्णित दुर्गा सप्तशती के अनुसार, जब देवी ने महिषासुर का वध किया, तब वे सिंह पर सवार थीं. सिंह शक्ति, पराक्रम, आत्मविश्वास और राजसत्ता का प्रतीक माना जाता है. यही कारण है कि माता दुर्गा को सिंहवाहिनी भी कहा जाता है. हालांकि, भारत के कई हिस्सों खासकर पूर्वी और दक्षिणी राज्यों में देवी को बाघ पर सवार दिखाया जाता है. इसका कारण स्थानीय परंपराएं और सांस्कृतिक प्रभाव हैं. बाघ को भी उतना ही शक्तिशाली और भयावह माना जाता है जितना सिंह को.

इस तरह मां बनी शेरावाली – सिंह संस्कृत शब्द है और शेर उसका हिंदी रूपांतरण है. सिंह को अंग्रेजी में लायन कहते हैं तो बाघ को टाइगर, वहीं चीता और तेंदुआ भी अलग अलग होते हैं लेकिन ये सभी बिल्ली की प्रजाति से संबंध रखते हैं. इन खतरनाक जानवरों पर केवल हमारी मां दुर्गा ही विराजमान रह सकती हैं इसलिए शेरावाली भी कहा जाता है, इसके पीछे के पौराणिक कथा है. कथा के अनुसार, जब माता पार्वती कठोर तपस्या कर रही थीं, तब एक भूखा सिंह तपस्या कर रहीं माता को खाने के उद्देश्य से वहां पहुंचा लेकिन वह माता के पास आकर चुपचाप बैठ गया और माता के उठने के इंतजार करने लगा. लेकिन माता की तपस्या को कई साल बीत गए लेकिन सिंह अपनी जगह से नहीं हठा और वह भी माता की तरह भूखा प्यासा बैठा रहा. जब माता पार्वती की तपस्या खत्म हुई तो उन्होंने अपने पास सिंह को बैठा देखा. दयालु माता ने इसे सिंह की तपस्या मान लिया और अपना वाहन बना लिया. इसी वजह से मां दुर्गा को शेरावाली कहा जाता है.

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माता की अन्य पौराणिक कथा – दूसरी पौराणिक कथा स्कंद पुराण में मिलती है. इस कथा के अनुसार, जब देवता और असुरों में संग्राम चल रहा था देवी पार्वती के पुत्र कार्तिकेय ने दो भाई सिंहमुखम और सुरापदमन नामक असुरों को पराजित कर दिया था. सिंहमुखम असुर अपने अंतिम समय में कार्तिकेय से माफी मांगने लगा, जिससे प्रसन्न होकर कार्तिकेय ने सिंहमुखम को सिंह बनाकर माता पार्वती की सेवा करने का अवसर दिया.

माता के अलग-अलग वाहन – देवी मां भवानी के कई स्वरूप और नाम हैं और हर स्वरूप में माता का वाहन अलग है. माता के पुत्र कार्तिकेय को स्कंद कहा जाता है इसलिए वे स्कंद माता भी कहलाती हैं. स्कंद माता को सिंह पर सवार दिखाया गया है. स्कंद माता के साथ ही कात्यायनी माता को सिंह पर सवार दिखाया गया है. माता कुष्मांडा और माता चंद्रघंटा की सवारी बाघ दिखाई गई है. नवरात्रि की प्रतिपदा तिथि और अष्टमी तिथि की स्वामी मां शैलपुत्री और महागौरी का वाहन वृषभ है. माता कालरात्रि की सवारी गधा है और माता सिद्धदात्रि कलम पर विराजमान भक्तों को आशीष दे रही हैं.

मां दुर्गा की सवारी को लेकर विरोधाभास नहीं – इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन समय में भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में सिंह और बाघ दोनों पाए जाते थे, इसलिए लोगों ने अपने-अपने क्षेत्र के प्रमुख पशु को देवी की सवारी के रूप में स्वीकार कर लिया. यही कारण है कि समय के साथ दोनों रूप प्रचलित हो गए. माता दुर्गा की सवारी को लेकर कोई विरोधाभास नहीं, बल्कि यह उनके विविध रूपों और व्यापक शक्ति का प्रतीक है. सिंह और बाघ दोनों ही देवी की असीम शक्ति और उनके रक्षक स्वरूप को दर्शाते हैं, जो भक्तों को साहस और आत्मविश्वास प्रदान करते हैं.

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