1662 ईस्वी में बने भव्य देवालय के गर्भगृह में कोई भी प्रतिमा नहीं, पहले थी रत्नों से जुड़ी

1662 ईस्वी में बने भव्य देवालय के गर्भगृह में कोई भी प्रतिमा नहीं, पहले थी रत्नों से जुड़ी

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1662 ईस्वी में बने भव्य देवालय के गर्भगृह में कोई भी प्रतिमा ही नहीं मौजूद

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अक्षय तृतीया का महत्व भारतीय संस्कृति और आस्था में अत्यंत विशेष स्थान रखता है. यह तिथि वैदिक परंपरा में उन शुभ दिनों में से एक मानी जाती है, जब बिना मुहूर्त देखे भी मांगलिक कार्य किए जा सकते हैं. अक्षय तृतीया के खास मौके पर हम आपको लक्ष्मी नारायण के एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां गर्भगृह में कोई मूर्ति ही नहीं है. आइए जानते हैं मंदिर के बारे में खास बातें…

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कभी क्षय ना होने वाली विशेष तिथि यानी अक्षय तृतीया का पर्व 19 अप्रैल दिन रविवार को पड़ रहा है. इस दिन नारायण व माता लक्ष्मी की आराधना का विशेष विधान है. देश-दुनिया में लक्ष्मी नारायण को समर्पित कई मंदिर हैं. मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल ओरछा में भी लक्ष्मी नारायण को समर्पित शानदार मंदिर है, जो अनोखी वास्तुकला और समृद्ध विरासत की छटा बिखेरती है. 1662 ईस्वी में राजा बीर सिंह देव द्वारा बनवाया गया यह मंदिर किले जैसी भव्य बनावट, दीवारों पर बने रंगीन भित्ति चित्रों, और बुंदेली कला के अद्भुत नमूने के लिए प्रसिद्ध है. आइए जानते हैं लक्ष्मी नारायण मंदिर के बारे में खास बातें…

मंदिर के मुख्य गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं
लक्ष्मी नारायण मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इस भव्य मंदिर के मुख्य गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है, फिर भी यह बड़ी संख्या में पर्यटकों और श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचता है. अनूठी वास्तुकला वाला लक्ष्मी नारायण मंदिर बुंदेला राजवंश की शान है. यह मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि एक मजबूत किले की तरह बना हुआ है. इसकी दीवारों पर तोप रखने के लिए विशेष खांचे बनाए गए हैं. मंदिर चूने के गारे और ईंटों से निर्मित है. चारों कोनों पर ऊंचे स्तंभ हैं जिन पर बेहद बारीक नक्काशी की गई है. मुख्य शिखर पर विघ्न विनाशन भगवान श्री गणेश की प्रतिमा स्थापित है.

मंदिर की दीवारें बेहद खास
मंदिर की दीवारें भी खास हैं, जो बुंदेली और मुगल कला शैली के मिश्रण से सजी हैं. इन पर रामायण की घटनाएं, भगवान कृष्ण के जीवन के दृश्य, युद्ध के दृश्य और सामाजिक जीवन को दर्शाने वाले चित्र बने हैं. इन चित्रों के रंग आज भी चटख हैं कि पर्यटक देखकर हैरत में पड़ जाते हैं. मंदिर में उत्कीर्ण एक खास चित्र में विशाल पौराणिक पक्षी शुंगी चिड़िया को दिखाया गया है, जो अपनी नुकीली चोंच से हाथियों को उठाकर उड़ जाता है.

रत्नों से जड़ी लक्ष्मी की सुंदर मूर्ति थी
राजा बीर सिंह देव ने 1662 ईस्वी में इस मंदिर का निर्माण करवाया था. बाद में 1793 में राजा पृथ्वी सिंह ने इसका जीर्णोद्धार कराया. मंदिर में धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा होती है. किवदंती है कि यहां पहले सोने और रत्नों से जड़ी लक्ष्मी की सुंदर मूर्ति थी, जिसे किसी शासक ने सुंदरता देख मोहवश चुरा लिया था तभी से गर्भगृह खाली है. मंदिर राम राजा मंदिर से जुड़ा हुआ है, जिसका मार्ग सुंदर पत्थरों से बना है.

इतिहास और कला का आनंद
मंदिर के विशेष आकर्षण की बात करें तो सुबह की सुनहरी रोशनी में मंदिर की नक्काशी और चित्र और भी खूबसूरत लगते हैं. यहां आकर पर्यटक ना सिर्फ इतिहास और कला का आनंद लेते हैं, बल्कि एक शांत और दिव्य वातावरण का भी अनुभव करते हैं. बुंदेलखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा वाले इस लक्ष्मी नारायण मंदिर में दीपावली और होली के साथ अन्य तर-त्योहारों पर शोभायात्राएं निकलती हैं और मंदिर सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बन जाता है.

कैसे पहुंचे लक्ष्मी नारायण मंदिर?
ओरछा पहुंचने के बाद लोकल ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी से आसानी से लक्ष्मी नारायण मंदिर पहुंचा जा सकता है. मंदिर पूरे दिन खुला रहता है और प्रवेश निःशुल्क है. ओरछा के लक्ष्मी नारायण मंदिर का नजदीकी रेलवे स्टेशन वीरांगना लक्ष्मीबाई रेलवे स्टेशन है, जो लगभग 15 किलोमीटर दूर है. वहीं, सड़क मार्ग से जाना चाहें तो ओरछा के लिए बस और टैक्सी आसानी से उपलब्ध है.

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Parag Sharma

पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें



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