विवाह करना क्यों है जरूरी? जानें गरुड़ पुराण की ये विशेष बातें

विवाह करना क्यों है जरूरी? जानें गरुड़ पुराण की ये विशेष बातें

Why is marriage necessary: हिंदू धर्म में 16 संस्कारों में विवाह भी एक संस्कार है. विवाह को गृहस्थ आश्रम की पहली सीढ़ी कहा जा सकता है. अगर आप से पूछा जाए कि विवाह क्यों जरूरी है तो आपके मन में इसके कुछ सामान्य से उत्तर आ सकते हैं, लेकिन गरुड़ पुराण में विवाह के महत्व को स्वर्ग की प्राप्ति और मोक्ष के संबंध में बताया गया है. आपके मन में विवाह को लेकर ऐसा उत्तर संभवत: न आया हो.

विवाह क्यों है जरूरी?

गरुड़ पुराण के अनुसार, मार्कण्डेय जी ने पितृ स्तोत्र सुनाया था, ​जिसमें विवाह का भी वर्णन आता है. प्राचीन काल में रुचि नामक एक प्रजापति थे. वे मोहमाया को छोड़कर धरती पर चारों ओर घूम रहे थे. उन्होंने घर का त्याग कर दिया था और एक समय खाना खाते थे. वे गृहस्थ नियमों से अलग थे. वे अकेले ही घूमते रहते थे.

एक दिन उनके पितरों ने उनसे पूछा कि तुमने किस वजह से विवाह नहीं किया है? विवाह स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति का माध्यम है. गृहस्थ आश्रम के बिना व्यक्ति को बंधन होता है क्योंकि गृहस्थ सभी देवताओं, पितरों, ऋषियों और याचकों की पूजा करके उत्तम लोक प्राप्त करते हैं.

वे लोग देवताओं को स्वाहा और पितरों को स्वधा शब्द के उच्चारण से और अतिथि को अन्न दान से प्रसन्न करते हैं. ऐसा न करने से तुम पर देव ऋण और पितृ ऋण हो रहा है. इसके साथ ही मनुष्य, ऋषि और अन्य प्राणियों के लिए भी तुम प्रतिदिन ऋणी हो रहे हो. संतान की उत्पत्ति, देव पूजा और पितृ तर्पण और संन्यास ग्रहण किए बिना ही तुम कैसे स्वर्ग प्राप्त करने की सोच सकते हो. इससे तुमको कष्ट मिलेगा, मृत्यु के बाद नरक में जाओगे और दूसरे जन्म भी क्लेश होगा.

विवाह अत्यंत दुख का कारण है

पितरों के सवाल पर रुचि प्रजापति ने कहा कि विवाह करने से अत्यंत दुख, पाप में वृद्धि और अंतकाल में दुर्गति होती है, इस वजह से उन्होंने विवाह नहीं किया. वे अपने ज्ञान से आत्मा को निर्मल करते रहते हैं. ज्ञानी पुरुषों को अपने ज्ञान से आत्मा को शुद्ध करते रहना चाहिए.

शास्त्र सम्मत कर्म दिलाते हैं मोक्ष

इस पर पितरों ने कहा कि यह कहना ठीक है, लेकिन जिस मार्ग पर तुम हो, वह कल्याण वाला नहीं है. जो अशुभ या शुभ कर्म हैं, वे बंधन का कारण नहीं हैं, जो पहले का कर्म है, वह भोग से खत्म हो जाता है. प्रारब्ध का जो पुण्य कर्म है, वह सुख और दुख के भोग से निरंतर खत्म होता रहता है. इस तरह से विद्वान आत्मा की शुद्धि करते रहते हैं और कर्म बंधन से उसकी रक्षा की जाती है.

रुचि ने कहा कि हे पितृगण! वेदों में कर्म मार्ग से अविद्या-माया की परिपुष्टि की गई है. अब आप सभी मुझे कैसे उसी मार्ग में चलने को कह रहे हैं. इस पर पितरों ने कहा कि कर्म से जो कुछ भी किया जाता है, वह सब अविद्या है. यह जो तुम बता रहे हो, वह सब सही है. लेकिन विद्या प्राप्त करने में कर्म ​ही माध्यम है. सज्जन व्यक्ति शास्त्र के बताए गए कर्म को करते हैं, उससे ही उनको मोक्ष मिल जाता है. कर्म का पालन न करने से बुरी गति मिलती है.

इसलिए विवाह है जरूरी

तुम्हारा मानना है कि विवाह न करके तुम स्वयं को शुद्ध कर रहे हो. लेकिन शास्त्रों के बताए गए कर्मों को न करने से जो पाप उत्पन्न हो रहे हैं, उससे तुम स्वयं को जला रहे हो. पितरों ने कहा कि अविद्या भी व्यक्ति के उद्धार के लिए है. अविद्या वाले कर्म करने से भी व्यक्ति का हित होगा. ये बंधन के लिए नहीं है, इससे मोक्ष मिलता है. इस वजह​ से तुम विधिपूर्वक अपना विवाह करो.

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