मकर संक्रांति के अगले दिन को महाराष्ट्र में इतना खास क्यों माना जाता है, जानिए इस परंपरा के पीछे की पूरी कहानी
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Makar Sankranti Traditions: महाराष्ट्र में मकर संक्रांति के अगले दिन को तिलगुल दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस दिन तिल और गुड बांटकर मीठी बातें करने का संदेश दिया जाता है. लोग पुराने मतभेद भूलकर एक दूसरे से मिलने जाते हैं. महिलाओं के हल्दी कुंकू और सामाजिक मेलजोल की खास परंपरा होती है. यह दिन रिश्तों में मिठास और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है.
Makar Sankranti Traditions: भारत में त्योहार सिर्फ एक तारीख नहीं होते, बल्कि उनसे जुड़ी परंपराएं, भावनाएं और जीवन की सीख भी होती है. मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है, जो पूरे देश में अलग अलग रूपों में मनाया जाता है. लेकिन महाराष्ट्र में इस त्योहार का असली रंग मकर संक्रांति के अगले दिन देखने को मिलता है. यहां यह दिन सिर्फ एक फॉलोअप डे नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल, रिश्तों की मिठास और नए साल की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है.

लोग इस दिन खास तौर पर एक दूसरे से मिलने जाते हैं, तिल गुल का आदान प्रदान करते हैं और पुराने मनमुटाव भुलाकर नई शुरुआत करते हैं. यही वजह है कि महाराष्ट्र में मकर संक्रांति के अगले दिन को बेहद खास माना जाता है और इसे पूरे दिल से मनाया जाता है.

महाराष्ट्र में मकर संक्रांति के अगले दिन को आमतौर पर संक्रांतनंतरचा दिवस या तिलगुल दिवस कहा जाता है. इस दिन का सबसे अहम रिवाज होता है तिल और गुड से बने तिल गुल बांटना. लोग एक दूसरे को तिल गुल देते हुए कहते हैं तिलगुल घ्या गोड गोड बोला. इसका मतलब होता है तिल गुल लो और मीठा मीठा बोलो. यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला संदेश है. इस परंपरा के जरिए लोगों को यह सिखाया जाता है कि जैसे तिल और गुड मिलकर मिठास बढ़ाते हैं, वैसे ही इंसानों को भी आपसी रिश्तों में मिठास बनाए रखनी चाहिए.
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मकर संक्रांति के अगले दिन की खासियत यह भी है कि इस दिन घर घर जाकर लोगों से मिलने की परंपरा निभाई जाती है. खास तौर पर महिलाएं इस दिन नए कपड़े पहनती हैं, हल्दी कुंकू का आयोजन करती हैं और एक दूसरे को तिल गुल, फूल और छोटे उपहार देती हैं. यह परंपरा सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समाज में आपसी सम्मान और अपनापन बढ़ाने का जरिया बनती है. इसी दिन कई जगहों पर नई बहुएं और नवविवाहित महिलाएं पहली बार समाजिक कार्यक्रमों में शामिल होती हैं, जिससे उनका परिवार और समाज से जुड़ाव मजबूत होता है.

इस दिन को खास मानने के पीछे एक सामाजिक कारण भी है. मकर संक्रांति सूर्य के उत्तरायण होने का पर्व है, यानी अंधकार से प्रकाश की ओर जाने का संकेत. अगले दिन का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि यह बदलाव को अपनाने और आगे बढ़ने का प्रतीक माना जाता है. पुराने गिले शिकवे भूलकर मीठी बातों के साथ नई शुरुआत करने का संदेश इसी दिन सबसे ज्यादा जोर से दिया जाता है. यही वजह है कि लोग इस दिन खास तौर पर उन लोगों से मिलने जाते हैं जिनसे लंबे समय से बातचीत नहीं हुई होती.

खाने पीने के लिहाज से भी यह दिन बेहद खास होता है. महाराष्ट्र के घरों में तिल गुल के अलावा वरण भात, भाजी, भाकरी और मीठे पकवान बनाए जाते हैं. कई जगहों पर इस दिन सामूहिक भोजन का आयोजन भी होता है. इसका मकसद सिर्फ स्वाद नहीं बल्कि मिल बैठकर खुशियां बांटना होता है. यही कारण है कि यह दिन पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने वाला माना जाता है.

मकर संक्रांति के अगले दिन का एक और पहलू है महिलाओं की भूमिका. इस दिन महिलाएं समाजिक परंपराओं को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं. हल्दी कुंकू के जरिए वे एक दूसरे के सुख समृद्धि की कामना करती हैं. यह परंपरा महिलाओं के बीच आपसी सहयोग और सम्मान को भी दर्शाती है. कई जगहों पर इस दिन जरूरतमंद लोगों को तिल गुल और कपड़े दान करने की भी परंपरा है, जिससे समाज में बराबरी और करुणा का भाव बना रहे.

आज के मॉडर्न समय में भी महाराष्ट्र में मकर संक्रांति के अगले दिन की यह परंपरा पूरी मजबूती से निभाई जाती है. चाहे शहर हो या गांव, लोग इस दिन रिश्तों को समय देना जरूरी समझते हैं. यही वजह है कि यह दिन सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक रूप से भी बेहद अहम माना जाता है. यह त्योहार हमें सिखाता है कि जिंदगी में मिठास बनाए रखना, रिश्तों को संभालना और आगे बढ़ना कितना जरूरी है.


