दान देने के बाद उसे वापस ले सकते हैं? क्या हैं नियम, महाभारत की घटना से मिलेगी स्पष्टता
Daan Ke Niyam: अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान चोरी के मामले ने सभी को चौंकाकर रख दिया है. सोशल मीडिया और आम जनमानस में इस घटना को लेकर काफी गुस्सा है. बात यहां तक हो रही है कि जिससे दान लिया है, उसे वापस करो. जिन लोगों ने दान की चोरी की है, उनके खिलाफ कार्रवाई हो रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या दिया गया दान वापस लिया जा सकता है? शास्त्रों में इसको लेकर क्या कहा गया है? दान कौन दे सकता है? दान देने के नियम क्या हैं?
दान के नियम क्या हैं?
शास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति दान नहीं दे सकता है. जो लोग अधर्मी हैं, पाप कर्म करके धन अर्जित किया है, वे दान करने के अधिकारी नहीं होते हैं. जो दान लेने वाला है, उसे ऐसा दान को स्वीकार नहीं करना चाहिए. ऐसे लोगों के दान स्वीकार्य योग्य नहीं होते हैं और न ही उससे पुण्य की प्राप्ति होती है.
दान कौन दे सकता है?
- जो व्यक्ति ईमानदारी से धन या वस्तु अर्जित किया है, वह दान करने का सच्चा पात्र होता है. चोरी, जुआ, रिश्वत या धोखे से कमाए गए धन का दान फलित नहीं होता.
- दान नि:स्वार्थ और अहंकार रहित भाव से करना चाहिए. जो व्यक्ति कर्तव्य समझकर दान करता है, उसके बदले में किसी अन्य चीज की कामना नहीं करता, वही सच्चा दान है.
- दान देने वाले को इस कार्य के लिए मन में दुख न हो. यदि वह दुखी मन से दान करता है तो वह भी दान फलित नहीं होता है.
- क्षमता के अनुसार दान देना चाहिए. आपके पास जो है, जितना है, उसे ही दान करना चाहिए.
- धर्म के मार्ग पर चलने वाले, ईश्वर में विश्वास रखने वाले, शुद्ध आचरण करने वाले, दूसरों पर परोपकार करने वालों से ही दान लेना शुभ होता है.
- अधर्मी, पापी, घमंडी, सूदखोर, व्यभिचारी और अनैतिक कार्य करने वाले व्यक्ति से दान नहीं लेना चाहिए.
- यदि कोई कुपात्र व्यक्ति से दान ग्रहण करता है तो उसका पुण्य, तप, तेज नष्ट हो सकता है.
दान किसे देना चाहिए?
- जिस प्रकार से दान देने वाले की योग्यता है, वैसे ही दान लेने वालों के लिए भी नियम है. सुपात्र व्यक्ति को ही दान देना चाहिए. अपात्रे रमते लक्ष्मी, कुपात्रे दानं विनिपात्यते, इसका अर्थ है कि कुपात्र यानि अयोग्य व्यक्ति को दिया गया दान नष्ट हो जाता है.
- भूखे, बीमार, अनाथ, वृद्ध, अपाहिज, असहाय व्यक्ति, वेदपाठी ब्राह्मण, संत, संन्यासी, गुरु आदि को दान देना पुण्य का काम होता है.
क्या दान वापस ले सकते हैं?
शास्त्रों के अनुसार, दिया गया दान वापस नहीं लिया जा सकता है. एक बार जब आपने किसी वस्तु का दान कर दिया तो उस पर आपका अधिकार खत्म हो जाता है. दान देकर उसे वापस लेने वाला व्यक्ति पाप का भागी बनता है.
मार्कण्डेय पुराण में कहा गया है कि जो व्यक्ति दान देकर उसे वापस मांगता है, वह निंदा का पात्र होता है और उसे नरक की प्राप्ति होती है. वहीं याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि आपने जो दान कर दिया, वह पाने वाले व्यक्ति का हो गया, उस पर आपका अधिकार खत्म हो गया. उसे वापस लेना चोरी के समान है.
महाभारत के दानवीर कर्ण की कथाएं आपने सुनी होंगी. इंद्र देव ने कर्ण से कवच और कुंडल दान में मांग लिया, वही उसकी मृत्यु का कारण बना. लेकिन कर्ण ने कभी दान की गई वस्तु को वापस नहीं मांगा.
राजा हरिश्चंद्र ने तो सपने में अपना पूरा राजपाट ऋषि विश्वामित्र को दान कर दिया था. जब ऋषि विश्वामित्र ने ये बात उनसे कही तो उन्होंने सारा राजपाट सौंप दिया और उसे वापस नहीं मांगा. ऋषि विश्वामित्र उनकी परीक्षा ले रहे थे, बाद में उन्होंने राजा हरिश्चंद्र को सबकुछ लौटा दिया.
दान वापस लेने वाला भोगता है कष्ट
महाभारत और श्रीमद्भागवत पुराण की कथा के अनुसार, राजा नृग ने ब्राह्मणों को गाएं दान कीं, लेकिन उनमें से एक गाय वापस राजा के गोशाला में आ गई. लेकिन राजा को ये बात पता नहीं थी. अगले दिन उन्होंने वही गाय दूसरे ब्राह्मण को दान कर दी. पहले वाले ब्राह्मण ने उस गाय को पहचान लिया और दोनों ब्राह्मणों में विवाद हो गया.
वे दोनों राजा नृग के पास गए और पूरी बात बताई. तो राजा नृग को अपनी गलती का एहसास हुआ. उन्होंने दूसरे ब्राह्मण से उस गाय को पहले ब्राह्मण को देने को कहा, लेकिन वह तैयार नहीं था. उन्होंने उस गाय के बदले 1 लाख अन्य गाय देने को कहा, लेकिन दोनों ब्राह्मण नहीं माने और नाराज होकर चले गए.
दान की गई गाय दूसरे ब्राह्मण को दान करने से राजा नृग पाप के भागी बन गए. इससे उनको मृत्यु बाद गिरगिट की योनि में जन्म लेना पड़ा. ये कई युग तक एक कुएं में तड़पते रहे. द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने उनका उद्धार किया.


