त्रेता युग में क्या खाते थे भगवान श्री राम? रामचरितमानस और रामायण में है भोजन का वर्णन

त्रेता युग में क्या खाते थे भगवान श्री राम? रामचरितमानस और रामायण में है भोजन का वर्णन

Bhagwan Ram Food Habits: त्रेता युग में भगवान विष्णु ने अयोध्या में राजा दशरथ और उनकी पत्नी कौशल्या के घर उनके पुत्र राम के रूप में जन्म लिया. रावण के वध के लिए प्रभु राम का जन्म हुआ था. उनके जीवन से जुड़ी घटनाओं पर रामायण, रामचरितमानस जैसे ग्रंथ लिखे गए हैं. इन ग्रंथों में ही भगवान राम के खान पान का भी वर्णन मिलता है. उस समय में श्रीराम क्या खाते थे, जिससे वे हमेशा स्वस्थ्य, बलवान और तेजवान दिखाई देते थे.

गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के बालकांड में लिखा है-
कनक थार सूचि सुंदर थारी। बिप्र बृंद जिमि जेवहिं भारी॥
अति बिचित्र बहु भांति रसोई। जाहि न जाइ बखानी सोई॥

इसका अर्थ है कि सोने के सुंदर थालियों में अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन परोसे जाते थे, जिनका शब्दों में वर्णन कर पाना कठिन है.

भोजन करत चपल दोउ भाई। कहि न जाइ कछु बाल सगाई॥
बंधु सखा संग जेवत नामा। करहिं कृपासिंधु सब कामा॥

इसका अर्थ है कि प्रभु राम अपने तीन छोटे भाइयों भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न के अलावा मित्रों के साथ बैठकर भोजन करते हैं. उनकी बाल क्रीड़ाएं और प्रेम भाव को देखकर कुछ कहा ही नहीं जाता.

भगवान राम जब माता शबरी के आश्रम में भाई लक्ष्मण के साथ पहुचते हैं, तो वो उनको प्रेम से खाने के लिए मीठे फल देती हैं. श्रीरामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में 35वां दोहा है-

कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुं आनि.
प्रेम सहित खाए प्रभु बारंबार बखानि॥

इसका अर्थ है कि प्रभु राम के आगमन पर शबरी ने उनको अत्यंत रसीले और स्वादिष्ट कंद, मूल और फल दिए. भगवान राम ने उन फलों को प्रेम से खाया और प्रशंसा की.

वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकांड में एक श्लोक है, जिसमें राम जी बताते हैं कि वे 14 साल तक वन में कैसे रहेंगे और उनका खानपान कैसा रहेगा?

चतुर्दश हि वर्षाणि वत्स्यामि विजने वने.
मधुमूलफलैर्जीवन् हविषेण च राघवो॥

इसका अर्थ है कि प्रभु राम बताते हैं कि वे 14 वर्ष वन में निवास करेंगे और वहां पर शहद, कंद, मूल, फल, फूल, हविष्यान्न यानि यज्ञ का भोजन खाकर ही अपना जीवन व्यतीत करेंगे.

हविष्य अन्न क्या होता है?

जब हम हवन करते हैं तो उसमें हविष्य का प्रयोग होता है. हविष्यान्न का अर्थ है वह पवित्र खाने वाली सामग्री, जिसे आहुति में दिया जा सके. ऋषि मुनि जब कठिन साधना करते थे, तो वे हविष्यान्न को ग्रहण करते थे, ताकि वे स्वयं को संयमित रख सकें.

हविष्यान्न में क्या-क्या होता है?

हविष्यान्न में पूरी तरह प्राकृतिक, बिना मिलावट वाली और सात्विक चीजें ही शामिल की जाती हैं. इसमें धान, जौ, गेहूँ, मूंग दाल, हरा मटर, तिल, गाय का दूध, दही, शुद्ध घी शामिल होता है. इनके अलावा सब्जियों में साग, अरबी, शकरकंद आदि, वहीं फल में केला, आम, कटहल, हरड़, गन्ने का रस, सेंधा नमक आदि शामिल थे.

हविष्यान्न में तेल, लहसुन, प्याज आदि का उपयोग नहीं होता. इसे मिट्टी या पीतल के बर्तन में पकाया जाता था. उस समय में ऋषि-मुनि सात्विक आहार में कंद-मूल, फल, शहद, गो-रस यानि गाय के दूध से बने खाद्य पदार्थों को ग्रहण करते थे.

ऐसे भोजन को ग्रहण करने से शरीर में सात्विक गुणों का प्रभाव बढ़ता है और व्यक्ति स्वयं को संयमित रखता है.

कुछ जगहों पर वर्णन है कि राजमहल में भगवान राम और उनके भाइयों को सात्विक भोजन परोसा जाता था. राजभवन में चावल के मालपुए, मोदक, भुना चावल, भात, दूध की खीर, खिचड़ी, तिल-दूध से बनी मिठाई, हविष्यान्न आदि खाने में दिया जाता था. उस समय में दूध, दही, मक्खन और घी का भी प्रयोग होता था.

त्रेतायुग के फलों में आम, केला, अनार, नारियल, गन्ना, कटहल, खजूर, जामुन, बेर आदि शामिल थे. इस फलों का रस भी पीने को दिया जाता था.

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