किसलिए करते हैं बुराई की प्रतीक हुलका का पूजन? जानें होली का ऐतिहासिक महत्व
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Holi Festival : होलिका ने प्रहलाद को जलाने का प्रयास किया, लेकिन अग्निदेव की कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका भस्म हो गई. इस घटना की स्मृति में होलिका-पूजन और होली का त्योहार मनाया जाता है.
प्रहलाद की भक्ति और होलिका की हार का प्रतीक है होलिका दहन.
हाइलाइट्स
- प्रहलाद की भक्ति और होलिका की हार का प्रतीक है होलिका दहन.
- अग्निदेव की कृपा से प्रहलाद बच गया और होलिका भस्म हो गई.
- होलिका-पूजन और होली का त्योहार इसी घटना की स्मृति में मनाया जाता है.
Holi 2025 : लोगों के मन में एक प्रश्न रहता है कि जिस होलिका ने प्रहलाद जैसे प्रभु भक्त को जलाने का प्रयत्न किया, उसका हजारों वर्षों से हम पूजन किसलिए करते हैं? होलिका-पूजन के पीछे एक बात है. जिस दिन होलिका प्रहलाद को लेकर अग्नि में बैठने वाली थी, उस दिन नगर के सभी लोगों ने घर-घर में अग्नि प्रज्वलित कर प्रहलाद की रक्षा करने के लिए अग्निदेव से प्रार्थना की थी. लोकहृदय को प्रहलाद ने कैसे जीत लिया था यह बात इस घटना में प्रतिबिम्बित होती है.
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अग्नि देव से नागाबासियों ने की प्रार्थना : अग्निदेव ने लोगों के अंतःकरण की प्रार्थना को स्वीकार किया और लोगों की इच्छा के अनुसार ही हुआ. होलिका नष्ट हो गई और अग्नि की कसौटी में से पार उतरा हुआ प्रहलाद नरश्रेष्ठ बन गया. प्रहलाद को बचाने की प्रार्थना के रूप में प्रारंभ हुई घर-घर की अग्नि पूजा ने कालक्रमानुसार सामुदायिक पूजा का रूप लिया और उससे ही गली-गली में होलिका की पूजा प्रारंभ हुई.इस त्योहार का मुख्य संबंध बालक प्रहलाद से है. प्रहलाद था तो विष्णुभक्त मगर उसने ऐसे परिवार में जन्म लिया, जिसका मुखिया क्रूर और निर्दयी था.
भगवान समझता था हिरण्यकश्यप : प्रहलाद का पिता अर्थात निर्दयी हिरण्यकश्यप अपने आपको भगवान समझता था और प्रजा से भी यही उम्मीद करता था कि वह भी उसे ही पूजे और भगवान माने. ऐसा नहीं करने वाले को या तो मार दिया जाता था या कैद-खाने में डाल दिया जाता था. जब हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद विष्णु भक्त निकला तो पहले तो उस निर्दयी ने उसे डराया-धमकाया और अनेक प्रकार से उस पर दबाव बनाया कि वह विष्णु को छोड़ उसका पूजन करे. मगर प्रहलाद की भगवान विष्णु में अटूट श्रद्धा थी और वह विचलित हुए बिना उन्हीं को पूजता रहा.सारे यत्न करने के बाद भी जब प्रहलाद नहीं माना तो हिरण्यकश्यप ने उसे मार डालने की सोची. इसके लिए उसने अनेक उपाय भी किए मगर वह मरा नहीं. अंत में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका, जिसे अग्नि में न जलने का वरदान था,को बुलाया और प्रहलाद को मारने की योजना बनाई. एक दिन निर्दयी हिरण्यकश्यप ने बहुत सी लकड़ियों का ढेर लगवाया और उसमें आग लगवा दी.
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प्रभु कृपा से बच गये प्रहलाद : जब सारी लकड़िया तीव्र वेग से जलने लगीं, तब राजा ने अपनी बहन को आदेश दिया कि वह प्रहलाद को लेकर जलती लकड़ियों के बीच जा बैठे. होलिका ने वैसा ही किया.दैवयोग से प्रहलाद तो बच गया, परन्तु होलिका वरदान प्राप्त होने के बावजूद जलकर भस्म हो गई. तभी से प्रहलाद की भक्ति और आसुरी राक्षसी होलिका की स्मृति में इस त्योहार को मनाते आ रहे हैं..
February 28, 2025, 10:26 IST
किसलिए करते हैं बुराई की प्रतीक हुलका का पूजन? जानें होली का ऐतिहासिक महत्व


