कामाख्या के बाद सबसे शक्तिशाली जागृत शक्तिपीठ मां छिन्नमस्तिका मंदिर, यहां अष्टमातृका और दक्षिण काली भी हैं मौजूद

कामाख्या के बाद सबसे शक्तिशाली जागृत शक्तिपीठ मां छिन्नमस्तिका मंदिर, यहां अष्टमातृका और दक्षिण काली भी हैं मौजूद

Gupt Navratri 2026 Maa Chhinnamastika Mandir: भगवती की आराधना का पर्व गुप्त नवरात्रि चल रहा है, जिसमें भगवती के साथ ही दस महाविद्याओं की आराधना की जाती है. शनिवार को नवरात्रि का छठवे दिन मां भगवती की पूजा अर्चना की जाएगी. गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं में से एक मां छिन्नमस्तिका की भी पूजा अर्चना की जाती है. शास्त्रों के अनुसार, माता छिन्नमस्ता देवी के एक हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर और दूसरे हाथ में खड्क है. मान्यता है कि छिन्नमस्ता महाविद्या सकल चिंताओं का अंत करती है और मन में चिंतित हर कामना को पूरा करती हैं. इस महाविद्या का संबंध महाप्रलय से है. महाप्रलय का ज्ञान कराने वाली यह महाविद्या भगवती पार्वती का ही रौद्र रूप है. माता छिन्नमस्ता का एक दिव्य मंदिर है, जो झारखंड में स्थित है. आइए जानते हैं माता छिन्नमस्ता के इस मंदिर के बारे में…

100 साल पुराना मंदिर
झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर रामगढ़ जिले में स्थित रजरप्पा का छिन्नमस्तिका मंदिर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण शक्तिपीठों में से एक है. असम के कामाख्या मंदिर को दुनिया का सबसे बड़ा जागृत शक्तिपीठ माना जाता है, जबकि रजरप्पा का यह मंदिर दूसरा सबसे बड़ा शक्तिपीठ कहा जाता है. यह मंदिर कई सौ साल पुराना माना जाता है, और वेदों, पुराणों के साथ ही दुर्गा सप्तशती में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है.

तंत्र साधना का प्रतीक है मंदिर
छिन्नमस्तिका का मंदिर भैरवी (भेड़ा) और दामोदर नदियों के संगम पर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है. रामगढ़ से यह मात्र 28 किलोमीटर दूर है. यहां देवी छिन्नमस्तिका की अद्भुत प्रतिमा है, जो सिर कटी हुई रूप में है. देवी ने अपने कटे सिर को एक हाथ में धारण किए हैं और उनके गले से निकलती तीन धाराएं हैं. यह रूप आत्म-बलिदान, परिवर्तन और तंत्र साधना का प्रतीक है.

दस महाविद्याओं के हैं अलग-अलग मंदिर
मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा और पवित्र मन से मां की आराधना करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यह स्थान तंत्र-मंत्र साधना के लिए भी बहुत प्रसिद्ध है. भक्त यहां पत्थर पर धागा बांधकर मन्नतें मांगते हैं. मुख्य मंदिर के अलावा परिसर में महाकाली, सूर्य भगवान, भगवान शिव, और दस महाविद्याओं के अलग-अलग मंदिर हैं. अन्य महाविद्याओं के मंदिर भी परिसर में हैं, जैसे तारा, षोडशी (त्रिपुर सुंदरी), भुवनेश्वरी, भैरवी, बगलामुखी, कमला, मातंगी, और धूमावती.

अष्टमातृका और दक्षिण काली भी मौजूद
मंदिर की वास्तुकला और कला असम के कामाख्या मंदिर से काफी मिलती-जुलती है. मंदिर के आसपास छोटे-छोटे मंदिर जैसे अष्टमातृका और दक्षिण काली भी हैं. झारखंड के अलावा, बिहार और पश्चिम बंगाल के साथ ही देश भर से साल भर भक्त यहां दर्शन के लिए आते हैं.

कृपा से जीवन की सभी बाधाएं होती हैं दूर
यह मंदिर ना केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक और पर्यटन महत्व का भी केंद्र है. यहां एक छोटा जलप्रपात भी है, जो सर्दियों में और भी खूबसूरत नजारा देता है और यहां परिवार-दोस्तों के साथ लोग पिकनिक पर भी आते हैं. वहीं, नदी में स्नान करने की परंपरा है. पूर्णिमा और अमावस्या तिथि पर यहां श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या में भीड़ जुटती है. विवाह और मुंडन संस्कार के लिए भी यह स्थान लोकप्रिय है. मकर संक्रांति और विजयदशमी पर यहां बड़े मेले लगते हैं, जिसमें लाखों श्रद्धालु आते हैं. गुप्त नवरात्रि में यहां विशेष पूजा-अर्चना होती है. भक्तों का मानना है कि मां छिन्नमस्तिका की कृपा से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और शक्ति प्राप्त होती है.

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