कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय के पिता की अनसुनी कहानी, क्यों कहा जाता है उन्हें ‘भागवत भास्कर’?

कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय के पिता की अनसुनी कहानी, क्यों कहा जाता है उन्हें ‘भागवत भास्कर’?

Bhagwat Bhaskar Krishna Chandra Shastri : मथुरा-वृंदावन की धरती सदियों से भक्ति, प्रेम और कथा परंपरा का घर रही है. यहां का हर कोना राधा-कृष्ण की मधुर लीला से भरा है और इसी संगीत के बीच कई संत, गुरु और कथावाचक जन्मे, जिन्होंने अपनी वाणी से देश और विदेश में भक्तों को मंत्रमुग्ध किया. आज इसी पावन परंपरा का एक उजला नाम है युवा और लोकप्रिय कथावाचक इंद्रेश उपाध्याय, जिनकी शादी 5 दिसंबर को जयपुर में होने जा रही है. शादी की रस्में शुरू होते ही देशभर के भक्त और श्रोता एक बार फिर उनके परिवार के बारे में जानने के इच्छुक दिखे, खासकर उस व्यक्तित्व के बारे में, जिनके मार्गदर्शन ने इंद्रेश को इस मुकाम तक पहुंचाया है.

बहुत लोग जानते हैं कि इंद्रेश उपाध्याय एक मजबूत आध्यात्मिक परंपरा से जुड़े हैं, पर हर किसी को यह नहीं पता कि उनके पिता कौन हैं, उन्हें ‘भागवत भास्कर’ क्यों कहा जाता है, और कैसे उनकी मेहनत ने कथा जगत में एक अनोखी पहचान बनाई. इंद्रेश के पिता कृष्ण चंद्र शास्त्री, जिन्हें हजारों भक्त प्रेम से ठाकुर जी बुलाते हैं, पिछले पांच दशकों से कथा के क्षेत्र में एक चमकता हुआ सितारा हैं. उनकी वाणी, विनम्रता और ज्ञान ने न सिर्फ मथुरा को गौरवान्वित किया, बल्कि दुनिया भर में उन्हें सम्मान मिला.

यह लेख आपको ठाकुर जी के जीवन, उनके संघर्ष, उनकी साधना और उनकी कथा यात्रा के उन पहलुओं से रूबरू कराएगा, जो उन्हें सच में ‘भागवत भास्कर’ बनाते हैं. साथ ही यह भी समझाएगा कि इंद्रेश उपाध्याय के व्यक्तित्व में उनके पिता की सीख और संस्कार किस तरह नजर आते हैं.

कथावाचक परिवार की विरासत
मथुरा-वृंदावन में कथा की चर्चा होते ही कई नाम याद आते हैं, लेकिन सबसे ऊपर जिस नाम की गूंज सुनाई देती है, वह है पंडित कृष्ण चंद्र शास्त्री, यानी पूज्य ठाकुर जी. इंद्रेश उपाध्याय उन्हीं के पुत्र हैं. यह परिवार कई पीढ़ियों से कथा परंपरा से जुड़ा है और आज भी वही ऊर्जा, वही भाव और वही भक्ति उनके हर आयोजन में दिखाई देती है.

जन्म और बचपन
ठाकुर जी का जन्म 1 जुलाई 1960 को वृंदावन के पास लक्ष्मणपुरा गांव में हुआ. उनके पिता पंडित राम शरण उपाध्याय और माता चंद्रावती देवी भक्तिमय जीवन जीने वाले सरल लोग थे. घर में हर दिन भागवत पाठ, भजन और संतों का आना-जाना होता था. ऐसे माहौल में पले-बढ़े ठाकुर जी पर बचपन से ही भक्ति का रंग चढ़ गया.

सिर्फ 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने मुंबई में पहली बार सात दिवसीय भागवत कथा सुनाई. इतनी कम उम्र में मिली यह शुरुआत उनके लिए जीवन का मजबूत आधार बनी.

50 वर्षों की निरंतर कथा यात्रा
पहली कथा के बाद यह यात्रा कभी रुकी नहीं. ठाकुर जी ने अब तक

-1500 से ज्यादा भागवत कथाएं,
-सैकड़ों रामकथाएं,
-और कई गीता ज्ञान यज्ञ
-देश-विदेश में किए हैं.

उनके द्वारा चलाए गए कई सात दिवसीय ज्ञान यज्ञ तो अब विश्व रिकॉर्ड में शामिल माने जाते हैं.

वैष्णव परंपरा से जुड़ाव और उपाधियां
ठाकुर जी ने जगन्नाथ पुरी में स्वामी गरुड़ध्वजाचार्य जी से दीक्षा ली. भक्तों के प्रेम ने उन्हें ‘ठाकुर जी’ नाम दिया, जबकि विद्वानों ने उनकी वाणी और ज्ञान को देखकर उन्हें ‘भागवत भास्कर’ की उपाधि दी. उनकी सोच और बोलचाल पर मोरारी बापू और स्वामी करपात्री जी के विचारों का गहरा असर दिखता है.

श्री कृष्ण प्रेम संस्थान सेवा का केंद्र
ठाकुर जी ने कथा के साथ-साथ समाज सेवा पर भी पूरा ध्यान दिया. वृंदावन में उन्होंने ‘श्री कृष्ण प्रेम संस्थान’ की स्थापना की, जहां बच्चों को वेद, पुराण और संस्कृत की मुफ्त शिक्षा दी जाती है.
साल 2003 में यहां शुरू हुई गोशाला आज बड़ा केंद्र बन चुकी है, जहां गो-सेवा और अन्नदान लगातार चलता रहता है.

इंद्रेश उपाध्याय के लिए प्रेरणा
इंद्रेश बचपन से ही अपने पिता के साथ कथा स्थल जाते रहे. उन्हें देखकर ही इंद्रेश ने बोलना, पढ़ना और कथा समझना सीखा. ठाकुर जी की साधना, उनकी सरलता और उनकी साफ सोच ने इंद्रेश को उस राह पर चलाया, जहां आज वह युवा पीढ़ी के पसंदीदा कथावाचक बन चुके हैं.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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