अंतिम संस्कार के बाद क्या करें और क्या नहीं? जानिए शास्त्रों में बताए गए नियम
अंतिम संस्कार के बाद क्या करें और क्या नहीं? जानिए शास्त्रों में बताए गए नियम
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श्मशान से लौटते समय पीछे मुड़कर क्यों नहीं देखते? छोटे बच्चों को अंतिम संस्कार में ले जाने से क्यों बचा जाता है? महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य के अनुसार इन परंपराओं का उद्देश्य मृत आत्मा के प्रति मोह का त्याग, उसकी सद्गति की कामना और घर लौटकर शुद्धि के माध्यम से नकारात्मकता को दूर रखना माना जाता है.
फरीदाबाद: श्मशान का नाम सुनते ही मन में कई तरह की मान्यताएं और सवाल एक साथ उठने लगते हैं. बचपन से सुनते आए हैं कि अंतिम संस्कार के बाद श्मशान से लौटते समय पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए…छोटे बच्चों को श्मशान नहीं ले जाना चाहिए और घर लौटने के बाद स्नान व शुद्धि के नियमों का पालन करना चाहिए. इन परंपराओं को लेकर लोगों के मन में अलग-अलग धारणाएं हैं. आखिर इन मान्यताओं के पीछे धार्मिक कारण क्या हैं और इनका क्या महत्व माना गया है…आइए जानते हैं.
लकड़ी का तिनका तोड़कर पीछे फेंकने की परंपरा
Local18 से बातचीत में महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं कि जब किसी शव का अंतिम संस्कार किया जाता है, तो वहां मौजूद लोगों को लकड़ी का एक-एक तिनका दिया जाता है. श्मशान से बाहर निकलते समय उस तिनके के दो टुकड़े करके पीछे की ओर फेंक दिए जाते हैं. बताते हैं कि इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए. ऐसा इसलिए माना जाता है ताकि उस जीवात्मा के साथ दोबारा मोह न जुड़ जाए. 60 से 70 साल तक का जो संबंध और मोह था…वह शरीर के समाप्त होने के साथ समाप्त हो गया. यही कामना की जाती है कि आत्मा की सद्गति हो और वह भटके नहीं.
श्मशान से शांतिपूर्वक निकल जाना चाहिए
महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं कि कई स्थानों पर यह भी मान्यता है कि अंतिम संस्कार के बाद श्मशान से निकलते समय किसी को आवाज लगाकर साथ चलने के लिए नहीं कहना चाहिए. लोग मानते हैं कि ऐसा करने से दूसरी बुरी आत्माएं भी साथ आ सकती हैं. इसलिए बिना किसी से कुछ कहे… शांतिपूर्वक वहां से निकल जाना चाहिए. लकड़ी का तिनका तोड़कर पीछे फेंकने का अर्थ भी यही होता है कि अब सांसारिक संबंध समाप्त हो गया है और आत्मा अपनी आगे की यात्रा पर निकल जाए.
छोटे बच्चों को श्मशान ले जाने से बचना चाहिए
महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं कि छोटे बच्चों को भी सामान्य परिस्थितियों में श्मशान नहीं ले जाना चाहिए. यदि 10 से 12 साल के बच्चे के पिता का निधन हो गया हो, तो किसी बड़े बुजुर्ग के साथ रहकर वह अपने पिता को मुखाग्नि दे सकता है. लेकिन यदि ऐसी कोई आवश्यकता नहीं है तो छोटे बच्चों को श्मशान ले जाने से बचना चाहिए. 18 से 20 साल की उम्र के युवक परिपक्व हो जाते हैं और वह ऐसी परिस्थितियों को समझने में सक्षम होते हैं. छोटे बच्चों का शरीर और मन दोनों नाजुक होते हैं इसलिए उन्हें इस वातावरण से दूर रखना उचित माना गया है.
श्मशान से आने के बाद क्या करें
महंत कामेश्वरानंद वेदांताचार्य बताते हैं कि श्मशान से घर लौटने के बाद सबसे पहले हाथ-पैर धोने चाहिए, फिर स्नान करना चाहिए और अंतिम संस्कार के दौरान पहने गए वस्त्रों को धो देना चाहिए. पूरी तरह शुद्ध होकर ही घर में प्रवेश करना चाहिए. कई स्थानों पर नीम की पत्ती चबाने, नीम की लकड़ी का तिनका तोड़कर तीन बार थूकने या फिर मिर्च को तोड़कर बाहर फेंकने की भी परंपरा है. बताते हैं कि अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रीति-रिवाज हैं लेकिन कड़वी चीजों का प्रयोग इस भावना के साथ किया जाता है कि जीवन के दुख और कड़वे अनुभव घर के बाहर ही रह जाएं…घर में सुख-शांति बनी रहे और किसी भी प्रकार की नकारात्मकता या बुरी शक्ति का प्रवेश न हो.
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विवेक कुमार एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं, जिन्हें मीडिया में 10 साल का अनुभव है. वर्तमान में न्यूज 18 हिंदी के साथ जुड़े हैं और हरियाणा, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की लोकल खबरों पर नजर रहती है. इसके अलावा इन्हें देश-…और पढ़ें


