Apara Ekadashi पर जानें बड़े से बड़े संतों की आत्माएं भी क्यों नहीं पहुंच पातीं वैकुंठ धाम

Apara Ekadashi पर जानें बड़े से बड़े संतों की आत्माएं भी क्यों नहीं पहुंच पातीं वैकुंठ धाम

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एकादशी पर जानें ज्यादातर आत्माएं वैकुंठ क्यों नहीं पहुंचती, कौन से हैं 7 द्वार

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Apara Ekadashi 2026: अपरा एकादशी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और संयम का प्रतीक भी है. इस दिन व्रत रखकर भगवान विष्णु की विधि विधान के साथ पूजा अर्चना करने पर सभी संकटों से मुक्ति मिलती है. अपरा एकादशी पर आज हम आपको बैकुंठ धाम के सात अदृश्य द्वार के बारे में बताएंगे, जिनको बड़े से बड़े संत की आत्माएं भी पार नहीं कर पातीं. जब तक कोई व्यक्ति इन सभी सात द्वारों को पार नहीं करता, मोक्ष के द्वार कभी पूरी तरह नहीं खुलते.

Apara Ekadashi 2026: ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को अपरा एकादशी का व्रत किया जाता है. धर्म शास्त्रों में बताया गया है कि भगवान विष्णु को समर्पित अपरा एकादशी का व्रत करने से सभी संकटों से मुक्ति मिलती है और व्यक्ति जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाता है. अपरा एकादशी के मौके हम आपको बैकुंठ धाम के सात ऐसे अद्श्य द्वार के बारे में बताएंगे, जो बड़े से बड़े संत तक पार नहीं कर पाते. हिंदू शास्त्रों में वैकुंठ को भगवान विष्णु का शाश्वत निवास बताया गया है, जो एक दिव्य लोक है जहां दर्द, डर, मृत्यु और पुनर्जन्म का कोई स्थान नहीं है. लेकिन प्राचीन वैष्णव परंपराओं के अनुसार, वैकुंठ तक पहुंचना आसान नहीं है. मानव आत्मा और भगवान विष्णु के बीच सात अदृश्य द्वार होते हैं. ये साधारण पत्थर या सोने के दरवाजे नहीं हैं, बल्कि ये आध्यात्मिक बाधाएं हैं, जो हर इंसान के भीतर छुपी होती हैं. तो आखिर ये रहस्यमय द्वार किस चीज की रक्षा कर रहे हैं?

पहला द्वार है इच्छा – वैकुंठ की ओर यात्रा काम यानी इच्छा से शुरू होती है. हिंदू दर्शन यह नहीं कहता कि सभी इच्छाएं बुरी हैं, लेकिन अनियंत्रित लालसा मन को हमेशा बेचैन रखती है. लोग लगातार धन, रिश्ते, प्रतिष्ठा और क्षणिक सुखों के पीछे भागते हैं, मानते हैं कि संतुष्टि उनके बाहर है. लेकिन जितना मन चाहता है, शांति उतनी ही दूर चली जाती है. शास्त्रों में इच्छा को पहली आध्यात्मिक बाधा बताया गया है क्योंकि सांसारिक लालसाओं से जुड़ाव आत्मा को असंतोष के अंतहीन चक्र में फंसा देता है.

क्रोध बनता है दूसरी बाधा – इच्छा के बाद आता है क्रोध. आध्यात्मिक परंपराएं क्रोध को ज्ञान और शांति को नष्ट करने का सबसे तेज तरीका मानती हैं. एक पल का गुस्सा रिश्तों को नुकसान पहुंचा सकता है, निर्णय को भ्रमित कर सकता है और वर्षों तक चलने वाला दुख पैदा कर सकता है. इसलिए संतों ने धैर्य को दिव्य गुण माना है. इस द्वार को पार करने का मतलब भावनाओं को पूरी तरह दबाना नहीं है, बल्कि बिना नफरत या विनाश के प्रतिक्रिया देना सीखना है.

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वह द्वार जिसे कम लोग पहचानते हैं – तीसरा द्वार है लोभ. बुनियादी जरूरतों के अलावा, लोभ कभी खत्म नहीं होता. कोई व्यक्ति धन, सफलता या शक्ति पा सकता है, फिर भी अधूरा महसूस करता है. हिंदू दर्शन चेतावनी देता है कि लोभ एक अंतहीन भूख पैदा करता है, जिसमें संतुष्टि असंभव हो जाती है. लोग तुलना, प्रतिस्पर्धा और संग्रह में लग जाते हैं, लेकिन भीतर शांति नहीं मिलती.

मोह जिसे कहते हैं भावनात्मक जाल – चौथा द्वार है मोह, जो भावनात्मक लगाव और भ्रम का प्रतीक है. इंसान स्वाभाविक रूप से परिवार, रिश्तों और जीवन से प्यार करता है, लेकिन आध्यात्मिक शिक्षाएं चेतावनी देती हैं कि अस्थायी चीजों पर भावनात्मक निर्भरता ठीक नहीं है. प्राचीन ऋषियों ने सिखाया कि मोह से हानि का डर पैदा होता है, जिससे दर्द और चिंता जन्म लेती है. इस द्वार को पार करने का मतलब प्यार छोड़ना नहीं है बल्कि बिना डर, नियंत्रण या भावनात्मक निर्भरता के प्यार करना है.

अभिमान और ईर्ष्या बंद करते हैं अगले द्वार – पांचवां और छठा द्वार है, अभिमान और ईर्ष्या. अभिमान लोगों को खुद को श्रेष्ठ मानने पर मजबूर करता है, जबकि ईर्ष्या दूसरों की सफलता से दुखी करती है. ये दोनों भावनाएं चुपचाप मन को विषाक्त कर देती हैं. आध्यात्मिक परंपराएं कहती हैं कि अभिमान इंसान को विनम्रता से दूर करता है, जबकि ईर्ष्या कृतज्ञता को नष्ट करती है. आज के तुलना और प्रतिस्पर्धा वाले युग में ये द्वार पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो सकते हैं.

सबसे कठिन है अंतिम द्वार – सातवां और आखिरी द्वार है अहंकार. हिंदू दर्शन के अनुसार, अहंकार वह झूठी पहचान है जो इंसान को खुद को दिव्य से अलग मानने पर मजबूर करती है. यह स्थिति, पहचान, नियंत्रण और व्यक्तिगत महत्व से जुड़ाव पैदा करता है. यहां तक कि आध्यात्मिक प्रगति भी अहंकार का रूप ले सकती है अगर मन में अभिमान आ जाए. इसलिए संतों ने अंतिम द्वार को सबसे कठिन बताया है.

अपरा एकादशी का आध्यात्मिक महत्व – हिंदू धर्म में अपरा एकादशी का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है. यह व्रत भगवान भगवान विष्णु को समर्पित होता है और ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है तथा जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है. पुराणों के अनुसार, अपरा एकादशी का व्रत करने से तीर्थ स्नान, दान और यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है. मान्यता है कि जो श्रद्धालु इस दिन उपवास रखकर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस अवसर पर भक्त विष्णु सहस्रनाम और गीता पाठ भी करते हैं.

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