शिव और सती के विवाह की कहानी में कैसे काट दिया गया राजा दक्ष का सिर ! जानें शिव के अपमान की कहानी
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Maha Shivratri 2025: भगवान शिव और सती का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से हुआ. दक्ष ने यज्ञ में शिव का अपमान किया, जिससे क्रोधित सती ने यज्ञकुंड में कूदकर आत्मदाह कर लिया. वीरभद्र ने दक्ष का वध किया.
सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए.
हाइलाइट्स
- सती ने दक्ष के यज्ञ में कूदकर आत्मदाह किया.
- दक्ष ने यज्ञ में भगवान शिव का अपमान किया.
- वीरभद्र ने दक्ष का वध कर दिया.
शिव और सती का विवाह: देवों के देव महादेव की पत्नी का नाम सती था. माता सती महाराज प्रजापति दक्ष की कन्या थीं. महाराज दक्ष के अनेकों कन्याएं होते हुए भी बहुत तप करके सती को भगवती से वरदान के रुप में प्राप्त किया. महाराज दक्ष चाहते थे एक अत्यंत शक्तिशाली पुत्री उनके यहां जन्म ले. भगवती ने स्वयं दक्ष के यहां सती के रूप में जन्म लिया. विवाह योग्य होने पर ब्रह्म जी ने दक्ष को बताया की सती शक्ति का स्वरूप हैं और शिव आदि पुरुष. इसलिए दक्ष ने ब्रह्म जी की बात मानकर सती का विवाह शिव से किया. आइये शिव विवाह की रोचक कहानी जानते हैं.
कैसे हुआ सती का जन्म : दक्ष प्रजापति की कई पुत्रियां थी. फिर भी दक्ष के मन में संतोष नहीं था. वे चाहते थे उनके घर में एक ऐसी पुत्री का जन्म हो, जो सर्व शक्तिसंपन्न हो एवं सर्व विजयिनी हो. जिसके कारण दक्ष एक ऐसी पुत्री के लिए तप करने लगे. तप करते करते अधिक दिन बीत गए तो भगवती आद्या ने प्रकट होकर कहा, मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूं. तुम किस कारण तप कर रहे हों? दक्ष नें तप करने का कारण बताय तो मां बोली मैं स्वय पुत्री रूप में तुम्हारे यहां जन्म धारण करूंगी. मेरा नाम होगा सती. मैं सती के रूप में जन्म लेकर अपनी लीलाओं का विस्तार करूंगी. फलतः भगवती आद्या ने सती रूप में दक्ष के यहां जन्म लिया. सती दक्ष की सभी पुत्रियों में सबसे अलौकिक थीं. सती ने बाल्य अवस्था में ही कई ऐसे अलौकिक आश्चर्य करने वाले कार्य कर दिखाए. जिन्हें देखकर स्वयं दक्ष को भी विस्मयता होती रहती थी.
शिव और सती का हुआ विवाह : जब सती विवाह योग्य हो गई तो दक्ष को उनके लिए वर की चिंता होने लगी. उन्होंने ब्रह्मा जी से इस विषय में परामर्श किया. ब्रह्मा जी ने कहा सती आद्या का अवतार हैं. आद्या आदि शक्ति और शिव आदि पुरुष हैं. अतः सती के विवाह के लिए शिव ही योग्य और उचित वर हैं. दक्ष ने ब्रह्मा जी की बात मानकर सती का विवाह भगवान शिव के साथ कर दिया. सती कैलाश में जाकर भगवान शिव के साथ रहने लगीं. भगवान शिव दक्ष के दामाद थे, किंतु एक ऐसी घटना घटीत हो गई जिसके कारण दक्ष के ह्रदय में भगवान शिव के प्रति बैर और विरोध भाव पैदा हो गया.
ब्रह्म जी ने किया सभा का आयोजन : एक बार देवलोक में ब्रह्मा ने धर्म के निरूपण के लिए एक सभा का आयोजन किया था. सभी बड़े देवता सभा में एकत्र होगये थे. भगवान शिव भी इस सभा में बैठे थे. सभा मण्डल में दक्ष का आगमन हुआ. दक्ष के आगमन पर सभी देवता उठकर खड़े हो गए, पर भगवान शिव खड़े नहीं हुए. उन्होंने दक्ष को प्रणाम भी नहीं किया. फलतः दक्ष ने अपमान का अनुभव किया. केवल यही नहीं, उनके ह्रदय में भगवान शिव के प्रति ईर्ष्या की आग जल उठी. वे उनसे बदला लेने के लिए समय और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे.
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दक्ष ने किया यज्ञ का आयोजन : एक बार सती और शिव कैलाश पर्वत पर बैठे हुए परस्पर वार्तालाप कर रहे थे. उसी समय आकाश मार्ग से कई विमान कनखल की ओर जाते हुए दिखाई पड़े. सती ने उन विमानों को दिखकर भगवान शिव से पूछा, प्रभु, ये सभी विमान किसके है और कहां जा रहे हैं? भगवान शकंर ने उत्तर दिया आपके पिता ने यज्ञ का आयोजन किया हैं. समस्त देवता इन विमानों में बैठकर उसी यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए जा रहे हैं.
सती ने दक्ष के यहां जाने की जिद की : इस पर सती ने दूसरा प्रश्न किया क्या मेरे पिता ने आपको यज्ञ में सम्मिलित होने के लिए नहीं बुलाया? भगवान शंकर ने उत्तर दिया, आपके पिता मुझसे बैर रखते है, फिर वे मुझे क्यों बुलाने लगे? सती मन ही मन सोचने लगीं फिर बोलीं यज्ञ के इस अवसर पर अवश्य मेरी सभी बहनें आएंगी. उनसे मिले हुए बहुत दिन हो गए. यदि आपकी अनुमति हो, तो मैं भी अपने पिता के घर जाना चाहती हूं. भगवान शिव ने उत्तर दिया, इस समय वहां जाना उचित नहीं होगा. आपके पिता मुझसे जलते हैं हो सकता हैं वे आपका भी अपमान करें. लेकिन सती पीहर जाने के लिए हठ करती रहीं. अपनी बात बार-बात दोहराती रहीं. उनकी इच्छा देखकर भगवान शिव ने पीहर जाने की अनुमति दे दी. उनके साथ अपना एक गण भी साथ में भेज दिया उस गण का नाम वीरभद्र था.
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जब सती का किया अपमान : घर में सती से किसी ने भी प्रेमपूर्वक वार्तालाप नहीं किया. दक्ष ने उन्हें देखकर कहा तुम क्या यहां मेरा अपमान कराने आई हो? तुम्हारे शरीर पर मात्र बाघंबर हैं. तुम्हारा पति श्मशानवासी और भूतों का नायक हैं. वह तुम्हें बाघंबर छोड़कर और पहना ही क्या सकता हैं. दक्ष के कथन से सती के ह्रदय में पश्चाताप का सागर उमड़ पड़ा. वे सोचने लगीं उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीं किया. भगवान ठीक ही कह रहे थे, बिना बुलाए पिता के घर भी नहीं जाना चाहिए.
यज्ञकुंड में नहीं था शिव का स्थान : सती उस यज्ञमंडल में गईं जहां सभी देवता और ॠषिमुनि बैठे थे तथा यज्ञकुण्ड में धूधू करती जलती हुई अग्नि में आहुतियां डाली जा रही थीं. सती ने यज्ञमंडप में सभी देवताओं के तो भाग देखे, किंतु भगवान शिव का भाग नहीं देखा. वे भगवान शिव का भाग न देखकर अपने पिता से बोलीं पितृश्रेष्ठ यज्ञ में तो सबके भाग दिखाई पड़ रहे हैं किंतु कैलाशपति का भाग नहीं हैं. आपने उनका भाग क्यों नहीं रखा? दक्ष ने गर्व से उत्तर दिया मैं तुम्हारे पति शिव को देवता नहीं समझता. वह तो भूतों का स्वामी, नग्न रहने वाला और हड्डियों की माला धारण करने वाला हैं. वह देवताओं की पंक्ति में बैठने योग्य नहीं हैं.
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क्रोधित हुई सती और यज्ञ में कूद पड़ी : सती के नेत्र लाल हो उठे. उन्होंने पीड़ा से तिलमिलाते हुए कहा मैं इन शब्दों को कैसे सुन रहीं हूं मुझे धिक्कार हैं. देवताओ तुम्हें भी धिक्कार हैं, तुम भी उन कैलाशपति के लिए इन शब्दों को कैसे सुन रहे हो जो मंगल के प्रतीक हैं और जो क्षण मात्र में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की शक्ति रखते हैं. वे मेरे स्वामी हैं. नारी के लिए उसका पति ही स्वर्ग होता हैं. जो नारी अपने पति के लिए अपमान जनक शब्दों को सुनती हैं उसे नरक में जाना पड़ता हैं. पृथ्वी सुनो, आकाश सुनो और देवताओं, तुम भी सुनो मेरे पिता ने मेरे स्वामी का अपमान किया हैं. मैं अब एक क्षण भी जीवित रहना नहीं चाहती. सती अपने कथन को समाप्त करती हुई यज्ञ के कुण्ड में कूद पड़ी. यज्ञमंडप में खलबली पैदा हो गई, हाहाकार मच गया. देवता उठकर खड़े हो गए. वीरभद्र क्रोध से कांप उठे. वे यज्ञ का विध्वंस करने लगे. यज्ञमंडप में भगदड़ मच गई. देवता और ॠषिमुनि भाग खड़े हुए. वीरभद्र ने देखते ही देखते दक्ष का मस्तक काटकर फेंक दिया.
February 14, 2025, 10:50 IST
शिव और सती के विवाह की कहानी में कैसे काट दिया गया राजा दक्ष का सिर?


