पुरी रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ के रथ के पहियों का क्या होता है? जानिए भक्तों को कैसे म
पुरी रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ के रथ के पहियों का क्या होता है जानिए…
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Jagannath Rath Yatra ke Baad Rath ka Kya Hota Hai: पुरी रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ के रथ के विशाल पहियों का यात्रा के बाद क्या होता है? इन पवित्र लकड़ियों को भक्तों तक कैसे पहुंचाया जाता है? रथयात्रा संपन्न होने के बाद इन लकड़ियों का विशेष महत्व होता है और इन्हें प्राप्त करने के लिए भक्तों में उत्सुकता रहती है. आइए जानते हैं पुरी की इस अनूठी परंपरा और रथ के पवित्र पहियों के पुनर्चक्रण की पूरी प्रक्रिया.
Jagannath Rath Yatra Wheels: ओडिशा के पुरी में आयोजित भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा केवल यात्रा तक सीमित नहीं होती, बल्कि इसके बाद भी कई धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं. हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होकर नौ दिनों तक (बहुड़ा यात्रा तक) निकाली जाती है. मान्यता है कि इस रथयात्रा में शामिल होने से व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है और बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है. लेकिन कभी आपने सोचा है कि रथयात्रा का समापन हो जाने के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथों का क्या होता है. सभी के रथ हर साल बनाए जाते हैं, सजाए जाते हैं और फिर पवित्र यात्रा शुरू होती है. आपको बता दें कि रथयात्रा और नीलाद्रि बीजे के बाद इन विशाल रथों को हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं रखा जाता, बल्कि धार्मिक परंपरा के अनुसार उन्हें निर्धारित विधि से अलग किया जाता है.
तीनों के रथ अलग-अलग
मंदिर परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष, भगवान बलभद्र का तालध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ हर वर्ष नई लकड़ियों से बनाए जाते हैं. इन तीनों पवित्र रथों की ऊंचाई और पहियों की संख्या अलग-अलग होती है. इन रथों में केवल भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए होते हैं. भगवान बलभद्र के रथ में 14 तो देवी सुभद्रा के रथ में 12 पहिए होते हैं. अगले वर्ष की रथयात्रा के लिए फिर से नए रथ तैयार किए जाते हैं. इसलिए पुराने रथों को सावधानीपूर्वक खोलकर उनकी लकड़ी को अलग कर लिया जाता है.
सामान्य नही हैं ये लकड़ियां
धार्मिक मान्यता है कि भगवान के विग्रहों को धारण करने वाले रथ की लकड़ी अत्यंत पवित्र होती है. इसी कारण इसे सामान्य लकड़ी नहीं माना जाता. रथ की कुछ लकड़ियों का उपयोग श्री जगन्नाथ मंदिर की पारंपरिक धार्मिक आवश्यकताओं, यज्ञ, हवन और अन्य अनुष्ठानों में किया जाता है. कई बार इनसे पूजा से जुड़े धार्मिक स्मृति-चिह्न या छोटे-छोटे पूजन सामग्री भी तैयार की जाती हैं. मान्यता है कि रथ की पवित्र लकड़ी घर में स्थापित करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भगवान जगन्नाथ की कृपा प्राप्त होती है.
घर पर रख सकते हैं ये पवित्र लकड़ियां
भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथ के कुछ हिस्सों को आप अपने घर पर भी लेकर जा सकते हैं. समय-समय पर मंदिर प्रशासन या अधिकृत संस्थाओं के माध्यम से रथ की लकड़ी से बने स्मृति-चिह्न, पूजा सामग्री या छोटे धार्मिक उत्पाद श्रद्धालुओं को उपलब्ध कराए जाते हैं. रथयात्रा के बाद रथ के कुछ हिस्सों को नीलामी के जरिए आप ले सकते हैं. रथ में रथ के पहिए सबसे खास होते हैं और सबसे ज्यादा नीलामी इन्ही पहियों की होती है. रथ यात्रा पूरी हो जाने के बाद रथों को खोलकर अलग कर दिया जाता है और उनके हिस्सों को लट्ठे पुरी स्थित मंदिर कार्यालय के भंडार कक्ष में सुरक्षित रखे जाते हैं, जहां से प्रक्रिया पूरी होती है.
कैसे मिलती हैं पवित्र लकड़ियां?
नीलामी और आवंटन की प्रक्रिया
मूल्य निर्धारण): मंदिर प्रशासन (SJTA) द्वारा हर साल रथ के पहियों, प्रभा और अन्य लकड़ी के हिस्सों के लिए एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रक्रिया (SOP) और शुरुआती बेस प्राइस तय किया जाता है.
दिलासा और बोलियां: जो भक्त या संस्थाएं रथ के हिस्से खरीदना चाहते हैं, उन्हें एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) के जरिए आवेदन करना होता है और सबसे ऊंची बोली लगाने वाले को ये पवित्र हिस्से दिए जाते हैं. इसे कई बार शुद्ध नीलामी की बजाय भक्त द्वारा टोकन राशि या स्वेच्छा से तय मूल्य से ज्यादा दान देकर प्राप्त किया जा सकता है.
नियम व शपथ पत्र: खरीदार को यह लिखित वादा करना होता है कि वे इन पवित्र लकड़ियों का अनादर या व्यावसायिक दुरुपयोग नहीं करेंगे और केवल श्रद्धा के लिए रखेंगे.
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पराग शर्मा Hindi News18 Digital में Chief Sub Editor के पद पर कार्यरत हैं. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, ग्रह-नक्षत्र, राशि और वास्तु से जुड़ी खबरों पर काम कर रहे हैं. भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेद…
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