कब होगा अधिकमास का समापन, क्या तब तक कोई शुभ काम करना सही नहीं होगा, जानिए पंडित जी की बात
Adhik Mas 2026: अधिकमास, जिसे पुरुषोत्तम मास या मलमास के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म में विशेष धार्मिक महत्व रखता है. वर्ष 2026 में यह पवित्र मास 15 जून को समाप्त होने जा रहा है. जैसे-जैसे इसके समापन की तिथि नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे लोगों के मन में यह सवाल भी बढ़ रहा है कि इस दौरान कौन-से कार्य करने चाहिए और किन कामों से बचना चाहिए.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अधिकमास को सांसारिक और मांगलिक कार्यों की तुलना में आध्यात्मिक साधना के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है. यही कारण है कि इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार या नए व्यापार की शुरुआत जैसे शुभ कार्यों को टालने की सलाह दी जाती है. हालांकि इसे अशुभ काल नहीं माना जाता, बल्कि इसे आत्मिक उन्नति और पुण्य संचय का विशेष अवसर बताया गया है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.
अधिकमास में मांगलिक कार्य क्यों नहीं किए जाते?
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार अधिकमास तब आता है जब एक चंद्र मास के दौरान सूर्य की कोई संक्रांति नहीं होती. इस कारण यह अतिरिक्त मास पंचांग में जोड़ा जाता है. पंडितों और ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि इस समय सूर्य की ऊर्जा अपेक्षाकृत कमजोर मानी जाती है, इसलिए नए भौतिक कार्यों या जीवन की बड़ी शुरुआतों के लिए यह अवधि उपयुक्त नहीं मानी जाती. इसी वजह से विवाह समारोह, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, नए व्यवसाय का उद्घाटन और अन्य मांगलिक संस्कार अधिकमास में सामान्यतः नहीं किए जाते. कई परिवार इस अवधि के समाप्त होने के बाद ही अपने शुभ कार्यों की तिथि तय करते हैं.
क्या अधिकमास अशुभ माना जाता है?
यह एक आम भ्रम है कि अधिकमास अशुभ होता है. वास्तव में धार्मिक ग्रंथों में इसे अत्यंत पवित्र और फलदायी समय बताया गया है. इसे भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण को समर्पित माना जाता है. इसलिए इस दौरान पूजा-पाठ, भजन, कीर्तन, जप, तप और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व बताया गया है. धर्माचार्यों का कहना है कि जो व्यक्ति इस मास में श्रद्धा और नियमपूर्वक भगवान की आराधना करता है, उसे विशेष आध्यात्मिक लाभ प्राप्त हो सकते हैं. यही कारण है कि देशभर के कई मंदिरों में इस अवधि के दौरान विशेष धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.
अधिकमास में क्या करना चाहिए?
अधिकमास को दान, पुण्य और सेवा का महीना भी कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान अन्नदान, वस्त्रदान, गौसेवा, जरूरतमंदों की सहायता और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन शुभ माना जाता है. ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरों तक, कई लोग इस समय व्रत रखते हैं और नियमित रूप से विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता या श्रीमद्भागवत का पाठ करते हैं. कुछ परिवार रोजाना दीपदान और तुलसी पूजा भी करते हैं. मान्यता है कि इस अवधि में किए गए सत्कर्मों का फल कई गुना बढ़कर प्राप्त होता है.
15 जून के बाद फिर शुरू होंगे शुभ कार्य
अधिकमास के समापन के साथ ही विवाह, गृह प्रवेश और अन्य मांगलिक कार्यों के लिए शुभ मुहूर्तों का दौर फिर से शुरू हो जाएगा. जिन परिवारों ने अपने कार्यक्रमों को रोक रखा है, वे अब आगामी शुभ तिथियों की तैयारी में जुट सकते हैं.
धार्मिक दृष्टि से अधिकमास आत्मचिंतन, भक्ति और सेवा का अवसर माना जाता है. ऐसे में इसके अंतिम दिनों में भी पूजा-पाठ और दान-पुण्य के कार्यों को महत्व देना शुभ माना जाता है.


