1000 साल पहले 80 टन का पत्थर 20 मंजिल ऊंचाई पर कैसे पहुंचा? इसका नहीं जवाब
1000 साल पहले 80 टन का पत्थर 20 मंजिल ऊंचाई पर कैसे पहुंचा? इसका नहीं जवाब
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Brihadeeswara Temple 80 ton stone mystery: तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर के शिखर पर 80 टन का एक पत्थर लगा है, जो जमीन से 20 मंजिल की ऊंचाई पर है. सवाल यह है कि 1000 साल पहले 80 टन का पत्थर 20 मंजिल ऊंचाई पर कैसे पहुंचा? इस अजूबे का विज्ञान के पास भी जवाब नहीं है.
तंजौर के बृहदेश्वर मंदिर के शिखर पर लगे 80 टन वजनी कुंभम का रहस्य. (Photo: AI)
Brihadeeswara Temple 80 ton stone mystery: भारत में ऐसे कई मंदिर हैं, जो अपने अंदर अचंभित कर देने वाले स्थापत्य कला और आध्यात्म के रहस्यों को समेटे हुए हैं. उनको देखना अपने आप में एक आश्चर्य से कम नहीं है. उनकी बनावट को देखकर यह सवाल उठता है कि क्या उस समय की इंजीनियरिंग आज के आधुनिक इंजीनियरिंग से कही उन्नत थी? अब दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर को ही ले लीजिए. 1000 साल पहले बना यह मंदिर आज के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के लिए एक अबूझ पहेली से कम नहीं है. इस मंदिर के शिखर पर 80 टन से अधिक वजन का एक पत्थर लगा है, जो 20 मंजिल के बराबर की ऊंचाई पर स्थापित है. अब उसे देखकर यह समझ ही नहीं आता कि इतना भारी भरकम पत्थर मंदिर के शिखर पर कैसे पहुंचाया गया होगा?
80 टन का कुंभम आज भी बना है रहस्य
तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर को राजराजेश्वरम भी कहते हैं. इस मंदिर के शिखर पर 80 टन से अधिक वजन के पत्थर से बना एक कुंभम लगा है, जो आज भी लोगों के लिए एक रहस्य से कम नहीं है. बताया जाता है कि इस कुंभम को एक ही पत्थर को तराशकर बनाया गया है. सबसे अजूबे कि बात यह है कि इतनी ऊंचाई पर इसे लगाया कैसे गया?
216 फीट ऊंचाई पर कैसे लगा कुंभम?
मंदिर के शिखर पर जहां कुंभम स्थापित है, उसकी जमीन से ऊंचाई लगभग 216 फीट है यानि एक 20 मंजिला इमारत के बराबर. 80 टन से अधिक वजन वाले कुंभम को इतनी ऊंचाई पर कैसे चढ़ाया गया होगा? आज के समय में इतनी ऊंचाई पर बिना किसी क्रेन की मदद से इतना वजनी सामान चढ़ाना संभव नहीं लगता है.
तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर.
6 किलोमीटर लंबे रैंप का अनुमान
इसके बारे में इतिहासकारों का कहना है कि उस समय में क्रेन जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं थीं. ऐसे में तब के इंजीनियरों ने इस कुंभम को मंदिर के शिखर पर लगाने के लिए कम से कम 6 किलोमीटर लंबा रैंप बनाया होगा, जो 80 टन से अधिक के वजन वाले कुंभम, अनके हाथियों और मजदूरों का भार रोकने में सक्षम रहा होगा. उस कुंभम को हाथियों और मजदूरों की मदद से रैंप के सहारे मंदिर के शिखर पर पहुंचाया होगा.
ग्रेनाइट पत्थरों से बना है शिव मंदिर
चोल राजा राजराज चोल प्रथम ने 11 वीं सदी में इस विशाल शिव मंदिर को बनवाया था. यह मंदिर ग्रेनाइट पत्थरों से बना है, जबकि उस मंदिर से 100 किलोमीटर के आसपास तक ग्रेनाइट पत्थरों का स्रोत नहीं है. पूरा मंदिर ग्रेनाइट पत्थरों से बना है. इसमें करीब 1.3 लाख टन ग्रेनाइट पत्थर लगे हैं. कहा जाता है कि यह दुनिया का पहला मंदिर है, जो ग्रेनाइट पत्थरों से बना है. यह मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है.
मंदिर का शिवलिंग और नंदी भी अद्भुत
इस विशाल मंदिर के गर्भ गृह में 12 फीट ऊंचा विशाल शिवलिंग स्थापित है, वहीं मंदिर के मुख्य द्वार पर शिव के प्रिय गण नंदी विराजमान हैं, जिनका वजन करीब 20,000 किलोग्राम है. इस नंदी को एक ही पत्थर से तराशकर बनाया गया है.
धरती पर नहीं पड़ती मंदिर की परछाई
इस मंदिर का एक और रहस्य है. कहा जाता है कि दोपहर के वक्त इस मंदिर के शिखर की परछाई धरती पर नहीं पड़ती है. इस मंदिर का निर्माण भी अद्भुत तरीके से किया गया है. इसमें चूने, गारे या सीमेंट का उपयोग नहीं हुआ है. इस मंदिर को इंटरलॉकिंग तकनीक यानि पत्थरों को आपस में फंसाकर बनाया गया है.
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कार्तिकेय तिवारी Hindi News18 Digital में Deputy News Editor के पद पर कार्यरत हैं. वर्तमान में धर्म, ज्योतिष, वास्तु और फेंगशुई से जुड़ी खबरों पर काम करते हैं. धर्म में पचांग, पुराणों और शास्त्रों के आधार पर व्…और पढ़ें


