अयोध्या का सप्त मंदिर, जिसमें विराजमान हैं गुरु, भक्त से लेकर मित्र तक, जो हैं प्रभु राम के जीवन के 7 प्रमुख पड़ाव
अयोध्या सप्त मंदिर
अयोध्या के विशाल राम मंदिर परिसर में सप्त मंदिर स्थित है. इस सप्त मंदिर में महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, देवी अहिल्या, निषादराज गुह और माता शबरी के मंदिर शामिल हैं. इस सप्त मंदिर में प्रभु राम के गुरु, भक्त से लेकर मित्र तक शामिल हैं. इन सभी लोगों का प्रभु राम के जीवन में बड़ा ही महत्व है. इस वजह से राम मंदिर परिसर के सप्त मंदिर में इनको स्थान दिया गया है.
महर्षि वशिष्ठ: महर्षि वशिष्ठ भगवान राम के राजगुरु थे. महर्षि वशिष्ठ को ब्रह्मा जी का मानस पुत्र कहा जाता है. वे त्रिकालदर्शी और एक महान तपस्वी थे. उन्होंने प्रभु राम को वेद, धर्म शास्त्र और नीतिशास्त्र की शिक्षा दी थी. समय समय पर वे राजा दशरथ का मार्गदर्शन भी करते थे.

महर्षि विश्वामित्र: रामायण काल में महर्षि विश्वामित्र ने भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण को अस्त्र, शस्त्र, दिव्यास्त्र आदि की शिक्षा दी थी. महर्षि विश्वामित्र एक क्षत्रिय थे, जिन्होंने अपने तप से ब्रह्मर्षि की उपाधि प्राप्त की थी. उनके मार्गदर्शन में राम और लक्ष्मण जी ने कई राक्षसों का वध किया. वे ही राम और लक्ष्मण को सीता के स्वयंवर में लेकर गए थे, जहां पर रामजी ने शिव धनुष तोड़कर सीता जी का वरण किया था.

अगस्त्य मुनि: भगवान राम को जब 14 वर्ष का वनवास होता है और वे वन जाते हैं तो उनकी मुलाकात अगस्त्य मुनि से होती है. अगस्त्य मुनि ने रावण वध के लिए राम जी को दिव्य अस्त्र प्रदान किए थे, जिसमें धनुष, बाणाें वाले तूरीण, तलवार और अमोघ कवच शामिल थे. उन्होंने लंका विजय के लिए राम जी का मार्गदर्शन भी किया था.

महर्षि वाल्मीकि: भगवान राम की कथा महर्षि वाल्मीकि के बिना पूरी नहीं हो सकती है. महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी, जो संस्कृत में लिखी गई. भगवन राम के राजा बनने के बाद जब सीता जी वन गई थीं, तब महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में उन्होंने शरण ली. वहां रहते हुए लव और कुश का जन्म हुआ. महर्षि वाल्मीकि ने ही लव और कुश को शस्त्र, शास्त्र, वेद आदि का ज्ञान दिया था.

देवी अहिल्या: रामायण में देवी अहिल्या की घटना का वर्णन है. वनवास के समय जब राम जी गौतम ऋषि के आश्रम गए, तो उनके चरण पत्थर बनी अहिल्या से स्पर्श हुए तो वह श्राप मुक्त हुई और वह अपने वास्तविक स्वरूप में आ गईं. देवी अहिल्या का विवाह गौतम ऋषि से हुआ था, लेकिन एक दिन देवताओं के राजा इंद्र ने छल से गौतम ऋषि का स्वरूप धारण कर लिया और अहिल्या का पतिव्रता धर्म भंग कर दिया. इस पर क्रोधित होकर गौतम ऋषि ने अहिल्या को पत्थर बन जाने का श्राप दिया था.

निषादराज गुह: रामायण में केवट का जिक्र तब आता है, जब वनवास के समय प्रभु राम को गंगा नदी पार करनी होती है. केवट निषादराज गुह अपनी नाव से राम, लक्ष्मण और सीता जी को गंगा नदी पार कराते हैं. उससे पहले वे राम जी के पैर धोते हैं क्योंकि उनको ये बात पता थी कि उनके चरण स्पर्श से पत्थर रूपी अहिल्या एक महिला बन गईं, उनको चिंता थी कि कहीं राम जी के पैरों के स्पर्श से उनकी नाव महिला बन गई तो उनके परिवार का पालन पोषण कैसे होगा. राम जी को गंगा पार कराने पर केवट ने कुछ नहीं लिया, उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से आपको मैंने गंगा पार कराई है, वैसे ही आप मुझे भवसागर से पार करा दें. निषादराज प्रभु राम के मित्र बने.

माता शबरी: वनवास के समय ही माता शबरी की मुलाकात राम और लक्ष्मण से हुई. जब उनको पता चला कि राम इस क्षेत्र से होकर जाने वाले हैं, तो उन्होंने राम जी के लिए मीठे बेर चुनकर रखे थे. जब राम जी माता शबरी की कुटिया में गए तो उन्होंने वही बेर राम और लक्ष्मण को खाने के लिए दिए. राम जी ने वे बेर बड़े ही प्रेम से खाए, लेकिन लक्ष्मण जी ने उसे फेंक दिया क्योंकि वे सभी बेर पहले से ही जूठे थे. माता शबरी ने जितने भी बेर रखे थे, उसे पहले स्वयं ही चख लिया था ताकि कोई खराब या खट्टी बेर उनके राम को न मिले. राम जी माता शबरी के प्रेम भाव को समझ गए, लेकिन लक्ष्मण जी अनभिज्ञ रहे. माता शबरी निश्छल राम भक्ति की प्रतीक हैं. माता शबरी ने आपना जीवन राम भक्ति और भगवान राम के आने की प्रतीक्षा में व्यतीत किया था.


