Parivartini Ekadashi 2025: इस शुभ मुहूर्त में करें भगवान विष्णु की आराधना, जानें पूजा विधि, व्रत का महत्व और क्या न करें?

Parivartini Ekadashi 2025: इस शुभ मुहूर्त में करें भगवान विष्णु की आराधना, जानें पूजा विधि, व्रत का महत्व और क्या न करें?

Parivartini Ekadashi 2025: हिंदू धर्म में सालभर में आने वाली सभी एकादशियों का खास महत्व होता है, लेकिन भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे परिवर्तनी एकादशी कहा जाता है, उसका महत्व और भी खास माना गया है. यह दिन भगवान विष्णु के भक्तों के लिए बहुत ही शुभ होता है. इसे जलझूलनी एकादशी या डोल ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है. इस दिन भक्त भगवान विष्णु की विशेष पूजा करते हैं और व्रत रखते हैं. मान्यता है कि इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु अपनी करवट बदलते हैं, इसलिए इसे परिवर्तनी एकादशी कहा गया है. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.

परिवर्तनी एकादशी 2025 में कब है?
परिवर्तनी एकादशी का व्रत आज रखा जा रहा है. व्रत रखने वालों को इसका पारण अगले दिन करना चाहिए, जो कि 4 सितंबर 2025 को दोपहर 01:36 से 04:07 बजे के बीच किया जाएगा. पारण का मतलब होता है व्रत को विधि के अनुसार पूरा करना और भोजन ग्रहण करना.

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पूजा की आसान विधि
इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र पहनें. पूजा स्थल को साफ करके भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर के सामने दीपक जलाएं. उन्हें तुलसी, फूल, फल, नारियल, मिठाई और पंचामृत अर्पित करें. इसके बाद भगवान विष्णु की कथा सुनें या पढ़ें. पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें. तुलसी की माला से मंत्र का कम से कम एक माला जप करना शुभ माना जाता है.

आज के दिन रात को जागरण करना और भजन कीर्तन करना भी अच्छा होता है. अगले दिन नियम के अनुसार व्रत का पारण करना जरूरी होता है. पारण करने से पहले भगवान विष्णु को भोग लगाएं और फिर भोजन करें. इस अवसर पर किसी जरूरतमंद को भोजन कराना और वस्त्र या अन्य चीजें दान देना भी पुण्य का काम माना जाता है.

इस दिन का धार्मिक महत्व
कहा जाता है कि परिवर्तनी एकादशी के दिन ही भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार यशोदा माता और नंद बाबा के साथ ब्रज में रथ यात्रा निकाली थी. इसी वजह से इस दिन कुछ जगहों पर भगवान को पालकी में बिठाकर नगर भ्रमण भी कराया जाता है. इसे जलझूलनी एकादशी इसलिए कहा जाता है क्योंकि भगवान को झूले पर बैठाया जाता है और उन्हें झुलाया जाता है.

एक और मान्यता के अनुसार, जब भगवान विष्णु चार महीने के लिए योग निद्रा में चले जाते हैं, तो परिवर्तनी एकादशी के दिन वे पहली बार करवट बदलते हैं. यही कारण है कि यह दिन आध्यात्मिक रूप से बहुत खास होता है. ऐसा कहा जाता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत रखने और भगवान की पूजा करने से सभी कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख शांति आती है.

एकादशी: आत्मसंयम और श्रद्धा का पर्व
एकादशी का दिन भक्तों के लिए विशेष होता है. इस दिन भोजन की जगह फलाहार या पानी तक न पीने का व्रत रखा जाता है. मान्यता है कि इस दिन मन और शरीर की पवित्रता सबसे अधिक मायने रखती है.

-चावल, गेहूं, दाल, मांस, प्याज, लहसुन जैसे खाद्य पदार्थों को इस दिन नहीं खाया जाता. इन्हें भारी और मन को विचलित करने वाला माना गया है. व्रत रखने वाले लोग हल्का भोजन करते हैं या केवल फल ग्रहण करते हैं.

-इस दिन का महत्व केवल खाने-पीने तक सीमित नहीं है. झूठ बोलना, किसी से रूखा व्यवहार करना या गुस्से में कुछ कहना भी उचित नहीं माना जाता. ऐसा करने से व्रत का असर कम हो सकता है. मन की शांति बनाए रखना और विनम्रता से पेश आना इस दिन का हिस्सा है.

-तुलसी के पत्तों को इस दिन तोड़ना मना होता है क्योंकि यह भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है. पूजा में पहले से रखे गए तुलसी पत्रों का ही उपयोग करें.

-एकादशी आत्मनियंत्रण, श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है. इस दिन के नियमों का पालन करके व्यक्ति अपने भीतर शुद्धता और संतुलन का अनुभव कर सकता है.

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