थिल्लई नटराज मंदिर, जहां भगवान शिव से माता पार्वती ने मानी हार, आकाश स्वरूप में पूजे जाते हैं महादेव
तमिलनाडु पर्यटन विभाग की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, यह मंदिर दक्षिण भारत के सबसे प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिरों में से एक है, जो कला, अध्यात्म और विज्ञान का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है. सावन के पवित्र महीने में यह मंदिर भक्तों और पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाता है.
आकाश रूप में पूजे जाते हैं भगवान शिव
चोल राजवंश के कुल देवता हैं नटराज
चोल राजवंश नटराज को अपना कुल देवता मानता था और उसी दौर में इस मंदिर का निर्माण हुआ. मंदिर की वास्तुकला कला और अध्यात्म के बीच की कड़ी को दर्शाती है, जहां दीवारों पर नाट्य शास्त्र के 108 करणों (नृत्य मुद्राओं) की नक्काशी देखी जा सकती है, जो भारतीय शास्त्रीय नृत्य भरतनाट्यम की नींव है. मंदिर परिसर में पांच प्रमुख सभाएं, कनक सभा, चित सभा, नृत्य सभा, देव सभा, और राज सभा स्थित हैं, जो इसकी भव्यता को और बढ़ाती हैं.
चिदंबरम रहस्यम
मंदिर की छत पर लगे हैं 21,600 स्वर्ण पत्र
मंदिर की छत पर 21,600 स्वर्ण पत्र लगे हैं, जबकि 72,000 स्वर्ण कीलें मानव शरीर की नाड़ियों के प्रतीक के तौर पर हैं. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी यह मंदिर अद्भुत है. पश्चिमी वैज्ञानिकों ने शोध के बाद सिद्ध किया कि नटराज प्रतिमा के पैर का अंगूठा विश्व की चुंबकीय भूमध्य रेखा का केंद्र बिंदु है. प्राचीन तमिल विद्वान थिरुमूलर ने 5,000 वर्ष पूर्व अपने ग्रंथ ‘थिरुमंदिरम’ में इस तथ्य का उल्लेख किया था, जो आज भी वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय है.
भगवान शिव से माता पार्वती ने मानी हार
हर साल फरवरी-मार्च में आयोजित होने वाला ‘नट्यांजलि नृत्य उत्सव’ इस मंदिर की सांस्कृतिक धरोहर को जीवंत करता है, जहां विश्वभर के नर्तक नटराज को अपनी कला समर्पित करते हैं.


