32 साल की मॉडल हर्षा ने किया अपना ही पिंडदान और मिला नया नाम, पर क्या हिंदू धर्म में ऐसा क
मॉडल हर्षा ने किया अपना ही पिंडदान और मिला नया नाम, जानें हिंदू धर्म के नियम
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हिंदू धर्म में पितरों की शांति और मोक्ष के लिए किए जाने वाले कर्मकांडों का विशेष महत्व माना गया है। इन्हीं में से एक प्रमुख अनुष्ठान है पिंडदान, जिसे आमतौर पर पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति के लिए किया जाता है. लेकिन 32 साल की मॉडल और इन्फ्लुएंसर हर्षा रिछारिया ने अपना ही पिंडदान कर दिया है और सन्यास ले लिया है. इस विशेष अनुष्ठान के बाद उनको नया नाम भी मिल गया है.
प्रयागराज महाकुंभ से चर्चाओं में आईं मॉडल और इन्फ्लुएंसर हर्षा रिछारिया ने अपना पिंडदान कर दिया है और संन्यास ले लिया है. उन्होंने कहा कि जो रिश्ते जरूरत के समय काम ना आएं, ऐसे रिश्तों का पिंडदान करने में दुःख कैसा? मध्य प्रदेश के उज्जैन में हर्षा रिछारिया ने अपने गुरुओं की उपस्थिति में अपना पिंडदान किया और धर्म के प्रति समर्पित हो गईं. वह अभी लगभग 32 साल की हैं और इस उम्र में उन्होंने अपना पिंडदान कर लिया. यह अनुष्ठान उज्जैन स्थित मौन तीर्थ आश्रम में महामंडलेश्वर सुमनानंद महाराज की उपस्थिति में संपन्न हुआ, जहां परंपरा के अनुसार उन्हें संन्यास दीक्षा दी गई. आइए शास्त्रों के माध्यम से जानते हैं क्या हिंदू धर्म में महिलाएं ऐसा कर सकती हैं या नहीं…
हर्षा रिछारिया को मिला नया नाम
विशेष अनुष्ठान के बाद हर्षा रिछारिया को एक नया नाम भी मिला है, अब वह स्वामी हर्षानंद गिरि के नाम से जानी जाएंगी. अनुष्ठान पूरा होने के बाद हर्षा रिछारिया ने कहा कि अब एक नई जिंदगी की शुरुआत हो रही है. पिछले डेढ़ साल से वह अपने उस मार्ग पर चल रही थीं, जिसकी शुरुआत उन्होंने की थी. बहुत विरोध हुआ, बहुत कुछ हुआ. ऐसे में मन में यह विचार भी आया कि इस मार्ग को छोड़ दूं, क्योंकि जिनके लिए और जिनके साथ के लिए वह यह सब कर रही थीं, वही साथ नहीं दे रहे थे, तो फिर किसके लिए यह करें?
पिंडदान के बाद हर्षा रिछारिया ने क्या कहा?
हर्षा रिछारिया ने आगे कहा कि जब उन्होंने सोचा कि वह इसे छोड़ देंगी, तो भीतर से सवाल आया कि क्या वह इसे छोड़ सकती हैं. धर्म के रास्ते पर एक बार चलकर उसे छोड़ने के बारे में कोई सोच नहीं सकता. उन्हें लगा कि वह इससे नहीं निकल सकतीं. उन्होंने आगे कहा कि वह काफी समय से संन्यास लेने के बारे में सोच रही थीं और अब जाकर उन्हें यह सौभाग्य मिला कि आज यह संभव हो सका. अब एक नई शुरुआत होगी. उन्होंने कहा कि अब तक वह सिर्फ अपने परिवार, माता-पिता और अपने लिए सोच रही थीं, लेकिन अब गुरुजी के मार्गदर्शन में धर्म और समाज के लिए सोचेंगी.
क्या जीवित व्यक्ति पिंडदान कर सकते हैं?
अब सवाल उठता है कि क्या हिंदू धर्म में जीवित महिलाएं अपना पिंडदान कर सकती हैं या नहीं. हिंदू धर्म में पितरों की शांति के लिए किए जाने वाले प्रमुख कर्मकांडों में पिंडदान का विशेष महत्व है. परंपरागत मान्यता के अनुसार यह अनुष्ठान केवल मृत पूर्वजों की आत्मा की तृप्ति और मोक्ष के लिए किया जाता है. धार्मिक ग्रंथों जैसे गरुड़ पुराण और अन्य धर्मशास्त्रों में स्पष्ट रूप से उल्लेख मिलता है कि पिंडदान मृतकों के लिए ही निर्धारित है. कुछ विशेष परिस्थितियों में अपवाद देखने को मिलते हैं. विद्वानों के अनुसार, संन्यास लेने वाले व्यक्ति अपने सांसारिक जीवन का त्याग करने के प्रतीक के रूप में स्वयं का पिंडदान कर सकते हैं. वहीं गया जैसे धार्मिक स्थलों पर कुछ लोग जीवनकाल में ही पिंडदान कर देते हैं, ताकि बाद में परिवार पर यह दायित्व ना रहे.
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पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें


