आपके हाथ में हैं 7 प्रमुख तीर्थ स्थान, तर्पण में है इनका विशेष महत्व, कैसे करें पहचान?
Hathon Mein Tirth Sthan: हिंदू धर्म में कई ऐसे संस्कार और अुष्ठान होते हैं, जिसमें पितरों, देवों और ऋषियों की विशेष पूजा होती है. कुछ पर्व और त्योहारों पर पितृ, देव और ऋषियों का तर्पण किया जाता है, जिसमें हथेली के तीर्थों का उपयोग होता है. हर व्यक्ति के हाथ में 7 प्रकार के तीर्थ होते हैं, जिनका तर्पण में विशेष महत्व होता है. सामान्य तौर पर तीर्थ उन स्थानों को कहां जाता है, जहां देवी, देवताओं या आध्यात्म से जुड़ी शक्तियों का वास होता है, जहां जाकर दर्शन, स्नान, दान, जप, तप आदि से मोक्ष और पुण्य की प्राप्ति होती है. आइए जानते हैं कि हाथों में कितने तीर्थ होते हैं? उनके क्या नाम हैं? इनका महत्व क्या है?
हाथों में तीर्थ कितने होते हैं?
शास्त्रों के अनुसार, हर व्यक्ति के दोनों हाथों में कुछ देव आदि के तीर्थ स्थानों के बारे में बताया गया है. आपके हाथ में देवतीर्थ, पितृतीर्थ, प्रजापतितीर्थ, ब्रह्मतीर्थ, अग्नितीर्थ, सोमतीर्थ और ऋषितीर्थ होते हैं.
- देव तीर्थ: हथेली के चारों अंगुलियों तर्जनी, मध्यमा, अनामिका और कनिष्ठा के आगे के हिस्सों पर देवीतीर्थ होते हैं.
- पितृ तीर्थ: आपकी हथेली की तर्जनी के मूल भाग में यानि अंगूठे के ठीक पहले वाली अंगुली जहां से प्रारंभ होती है, वहां पर पितृतीर्थ होता है.
- प्रजापति तीर्थ: हथेली की कनिष्ठा अंगुली यानि जो सबसे छोटी अंगुली है, उसके मूल भाग यानि की जहां से उसकी शुरुआत हो रही है, वहां पर प्रजापतितीर्थ होता है. इसे कायतीर्थ भी कहा जाता है.
- ब्रह्म तीर्थ: हाथ के अंगूठे का प्रारंभ जिस स्थान से होता है, वहां पर ब्रह्मतीर्थ स्थान माना जाता है.
- अग्नि तीर्थ: ऐसे ही आपके दाहिने हाथ की हथेली के ठीक बीच में अग्नितीर्थ का स्थान होता है.
- सोम तीर्थ: ऐसे ही हमारे बाएं हाथ की हथेली के मध्य में यानि बीचोबीच में सोमतीर्थ विद्यमान होता है.
- ऋषि तीर्थ: आपकी हथेली की सभी अंगुलियों के पोरों और जोड़ों में ऋषितीर्थ होता है.
हाथ के तीर्थों का तर्पण में महत्व
अमावस्या, पूर्णिमा, विशेष स्नान, पर्व आदि के दिन जब हम स्नान करते हैं तो उसके बाद देव, पितृ और ऋषियों के लिए जल से तर्पण करते हैं. तर्पण में हाथ के तीर्थों का उपयोग किया जाता है.
जब हम देवताओं को जल से तर्पण देते हैं तो जलांजलि देवतीर्थ से देते हैं. इसमें हथेली के सभी हिस्सों का उपयोग नहीं किया जाता है.
ऐसे ही जब पितरों को जल से तर्पण दिया जाता है तो हथेली के पितृतीर्थ से जलांजलि देते हैं.
ऋषियों को तर्पण करने के लिए प्रजापति तीर्थ का उपयोग जलांजलि देने के लिए करते हैं.
मनुष्यों पर तीन प्रकार के ऋण होते हैं. देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण. इन तीनों ही ऋणों से मुक्ति के लिए तर्पण करना जरूरी होता है. यदि आप इन तीन ऋण से मुक्त नहीं होंगे, तो आपको मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी.


