अरविंद के घर दिवाली पर हुआ परिजन का निधन, क्या अब हमेशा के लिए बंद हो जाएगा त्योहार? प्रेमानंद जी महाराज ने बताई सच्चाई
Death On Festive Day: भारत में पर्व और त्योहार सिर्फ खुशी मनाने का जरिया नहीं होते, बल्कि ये हमारी आस्था, परंपरा और परिवार से गहराई से जुड़े होते हैं. हर त्योहार अपने साथ खुशियां, रीति-रिवाज और साथ बैठकर समय बिताने का मौका लेकर आता है, लेकिन कई बार जीवन में ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, जो इन खुशियों पर गहरी छाया डाल देती हैं. खासतौर पर तब, जब किसी पर्व या त्योहार के दिन ही परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए. ऐसी स्थिति में घर का माहौल अचानक बदल जाता है. जहां एक तरफ लोग त्योहार की तैयारियों में लगे होते हैं, वहीं दूसरी तरफ शोक और दुख का वातावरण बन जाता है. इसी कारण समाज में एक धारणा काफी समय से चली आ रही है कि जिस पर्व के दिन घर में किसी की मृत्यु हो जाए, वह त्योहार दोबारा नहीं मनाया जाता. कई परिवारों में तो यह भी कहा जाता है कि जब तक उसी तिथि पर घर में किसी का जन्म न हो जाए, तब तक उस पर्व को मनाना वर्जित होता है, लेकिन क्या यह सोच सही है? क्या धर्मग्रंथों में सच में ऐसा कोई नियम लिखा है? या फिर यह केवल समाज द्वारा बनाई गई परंपरा है, जिसे लोग बिना सवाल किए निभाते आ रहे हैं? इन्हीं सवालों का जवाब देने के लिए आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद जी महाराज ने इस विषय पर साफ और सरल शब्दों में अपनी बात रखी है, जो हर किसी के लिए जानना जरूरी है.
पर्व के दिन मृत्यु होने पर क्या करना चाहिए?
जब प्रेमानंद जी महाराज से पूछा गया कि अगर किसी पर्व के दिन घर में किसी सदस्य की मृत्यु हो जाए, तो उस दिन क्या करना चाहिए, तो उन्होंने बहुत सहज तरीके से जवाब दिया. उनका कहना है कि मृत्यु के समय घर में शोक का माहौल होना बिल्कुल स्वाभाविक है. ऐसे में नाच-गाना, सजावट और उत्सव मनाना संभव भी नहीं होता. इसी वजह से जिस दिन मृत्यु होती है, उस दिन त्योहार नहीं मनाया जाता. यह कोई नियम नहीं, बल्कि इंसानी भावनाओं से जुड़ी बात है. उस दिन मन दुखी होता है, इसलिए उत्सव का भाव अपने आप नहीं रहता. हालांकि, प्रेमानंद जी महाराज यह भी कहते हैं कि उस दिन पूरी तरह धार्मिक काम बंद नहीं होते. शांत मन से प्रभु का नाम लेना, कथा सुनना, जप या कीर्तन करना किया जा सकता है.
क्या वह त्योहार जीवनभर नहीं मनाना चाहिए?
अकसर घर के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि जिस पर्व के दिन मृत्यु हुई हो, वह पर्व फिर कभी नहीं मनाया जाता. कई लोग इसे पीढ़ियों से निभाते आ रहे हैं, बिना यह जाने कि इसका आधार क्या है. इस सवाल पर प्रेमानंद जी महाराज ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह धारणा बिल्कुल गलत है. उनका कहना है कि धर्मग्रंथों में कहीं भी ऐसा नहीं लिखा है कि मृत्यु के कारण किसी पर्व को हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए. यह केवल समाज में बनी एक सोच है, जो धीरे-धीरे नियम की तरह मान ली गई.
शास्त्रों में क्या कहा गया है?
प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं कि शास्त्रों में मृत्यु के बाद शोक की अवधि बताई गई है. आम तौर पर 11 दिनों तक शोक मनाने की परंपरा है. इस दौरान उत्सव, विवाह या बड़े आयोजन नहीं किए जाते, लेकिन जैसे ही यह अवधि पूरी होती है, जीवन फिर से सामान्य हो जाता है. उनका कहना है कि अगर इस सोच को मान लिया जाए कि मृत्यु के कारण त्योहार हमेशा के लिए बंद हो जाएं, तो फिर दुनिया में कोई भी पर्व नहीं मनाया जा सकेगा. रोज हजारों लोगों की मृत्यु होती है, लेकिन इससे प्रकृति का चक्र नहीं रुकता और न ही धर्म का मार्ग.
मृत्यु और त्योहार का आपस में क्या संबंध है?
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, मृत्यु जीवन का एक सच है और पर्व जीवन में उत्साह भरने के लिए होते हैं. दोनों को संतुलन में समझना जरूरी है. मृत्यु के दिन शोक मनाना जरूरी है, लेकिन उसके बाद जीवन को रोक देना सही नहीं है. त्योहार हमें ईश्वर की याद दिलाते हैं, सकारात्मकता देते हैं और परिवार को जोड़ते हैं. ऐसे में किसी गलत धारणा के कारण इनसे दूरी बना लेना न धर्म कहता है और न ही शास्त्र.

समाज में फैली गलतफहमियों से कैसे बचें?
प्रेमानंद जी महाराज का साफ कहना है कि हर परंपरा को आंख बंद करके मानना ठीक नहीं. जो बात धर्मग्रंथों में लिखी हो और संतों ने बताई हो, उसी को अपनाना चाहिए. समाज में फैली डर या भ्रम पर आधारित मान्यताओं से दूर रहना ही समझदारी है.
पर्व के दिन मृत्यु होने पर उस दिन शोक मनाना स्वाभाविक है, लेकिन जीवनभर उस त्योहार को न मनाने की सोच गलत है. शोक की अवधि पूरी होने के बाद फिर से पर्व मनाए जा सकते हैं. यही शास्त्रों की सीख है और यही प्रेमानंद जी महाराज का संदेश भी.


