अंतिम समय में तुलसी का पत्ता और गंगाजल क्यों दिया जाता है? जानिए क्या कहता है गरुड़ पुराण
Hindu Death Rituals: जीवन और मृत्यु, दोनों ही इंसानी अस्तित्व के ऐसे पड़ाव हैं जिनसे जुड़ी परंपराएं सदियों से लोगों की आस्था का हिस्सा रही हैं. हिंदू धर्म में जन्म से लेकर अंतिम विदाई तक कुल 16 संस्कारों का जिक्र मिलता है और इनमें सबसे आखिरी संस्कार अंत्येष्टि माना जाता है. आपने अक्सर देखा होगा कि जब किसी व्यक्ति के जीवन के अंतिम क्षण चल रहे होते हैं, तब उसके परिजन उसके मुख में गंगाजल की कुछ बूंदें डालते हैं और तुलसी का पत्ता रखते हैं. बहुत से लोग इसे केवल एक धार्मिक परंपरा मानते हैं, लेकिन इसके पीछे गहरा आध्यात्मिक संदेश और शास्त्रीय मान्यता जुड़ी हुई है.
खासकर गरुड़ पुराण में इस अनुष्ठान का विस्तार से वर्णन मिलता है. मान्यता है कि अंतिम समय में तुलसी और गंगाजल का स्पर्श आत्मा की यात्रा को सहज बनाता है और उसे ईश्वर के करीब ले जाता है. आइए जानते हैं कि इस परंपरा के पीछे क्या मान्यताएं हैं और क्यों इसे हिंदू धर्म में इतना खास माना जाता है.
क्या कहता है गरुड़ पुराण?
गरुड़ पुराण में जीवन, मृत्यु, कर्म और मोक्ष से जुड़े कई प्रसंगों का उल्लेख मिलता है. इस ग्रंथ के मुताबिक, जब व्यक्ति की आत्मा शरीर छोड़ने वाली होती है, तब उसे अपने जीवन के कर्मों का बोध होने लगता है. इसी समय तुलसी और गंगाजल का महत्व सबसे ज्यादा माना गया है. शास्त्रों के अनुसार, यह अनुष्ठान केवल एक रीति नहीं, बल्कि आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने का प्रतीक भी है.
1. यमदूतों के भय से मुक्ति की मान्यता
तुलसी को क्यों माना जाता है खास? तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय माना जाता है. इसी वजह से इसे “हरिप्रिया” भी कहा जाता है. गरुड़ पुराण में वर्णन मिलता है कि जिस व्यक्ति के अंतिम समय में उसके मुख, सिर या छाती के पास तुलसी रखी जाती है, उसके पास यमदूत नहीं आते. मान्यता है कि ऐसे व्यक्ति की आत्मा की रक्षा स्वयं विष्णुदूत करते हैं और उसे सम्मानपूर्वक वैकुंठ धाम तक पहुंचाते हैं. धार्मिक मान्यताओं में विश्वास रखने वाले लोग इसे आत्मा की शांति और ईश्वर की कृपा का प्रतीक मानते हैं.
2. गंगाजल का आध्यात्मिक महत्व
क्यों पवित्र माना जाता है गंगाजल? गंगा नदी को सनातन परंपरा में सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि मां गंगा के रूप में पूजा जाता है. मान्यता है कि गंगाजल भगवान विष्णु के चरणों से निकला और भगवान शिव की जटाओं से होकर धरती पर पहुंचा. धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, यदि मृत्यु के समय गंगाजल की कुछ बूंदें व्यक्ति के कंठ से नीचे उतर जाएं, तो उसके जीवनभर के पापों का क्षय होता है. यह पवित्र जल आत्मा को मोह-माया से मुक्त करने में सहायक माना जाता है. इसी वजह से देश के कई घरों में लोग गंगाजल को सुरक्षित रखते हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर धार्मिक कार्यों में उसका उपयोग किया जा सके.
सिर्फ आस्था नहीं, भावनात्मक सहारा भी
धर्म विशेषज्ञों का मानना है कि यह परंपरा केवल मोक्ष की कामना तक सीमित नहीं है. जब परिवार के सदस्य अपने प्रियजन के अंतिम समय में तुलसी और गंगाजल अर्पित करते हैं, तो यह उनके प्रेम, सम्मान और भावनात्मक जुड़ाव का भी प्रतीक बन जाता है. ग्रामीण इलाकों से लेकर बड़े शहरों तक, आज भी करोड़ों परिवार इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाते हैं. बदलते दौर में भले ही जीवनशैली बदल गई हो, लेकिन अंतिम संस्कार से जुड़ी कई मान्यताएं अब भी लोगों की आस्था का हिस्सा हैं.
शास्त्रों में वर्णित श्लोक
गरुड़ पुराण में एक प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख मिलता है-
“तुलसीदलयुक्तं जलं यो पिबेत् मरणे काले.
स गच्छति परं धाम यत्र न म्रियते पुनः..”
इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति मृत्यु के समय तुलसी युक्त जल ग्रहण करता है, वह परम धाम को प्राप्त करता है और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


