Vijaya Ekadashi Vrat Katha: विजया एकादशी व्रत कथा, यहां पढ़ें हर कर्य में विजय देने वाली संपूर्ण व्रत कथा

Vijaya Ekadashi Vrat Katha: विजया एकादशी व्रत कथा, यहां पढ़ें हर कर्य में विजय देने वाली संपूर्ण व्रत कथा

Vijaya Ekadashi 2026 Katha: आज विजया एकादशी व्रत है, इस व्रत को रखने से व्यक्ति को सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. इस व्रत को फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है. विजया एकादशी के दिन भक्तगण उपवास रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा करते हैं. इस दिन विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और व्रत कथा का पाठ किया जाता है. विजया एकादशी व्रत कथा का पाठ करनान केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह व्यक्ति को आत्मशुद्धि और आत्मसंयम की प्रेरणा भी देता है. यहां पढ़ें विजया एकादशी व्रत कथा…

विजया एकादशी व्रत कथा | Vijaya Ekadashi Vrat Katha

धर्मराज युधिष्‍ठिर भगवान श्रीकृष्ण से बोले, हे जनार्दन! आप फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? और उसकी विधि क्या है? कृपया करके आप मुझे बताइए. श्रीकृष्ण ने कहा कि हे राजन्, फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम विजया एकादशी है. इसके व्रत के प्रभाव से मनुष्‍य को विजय प्राप्त‍ होती है. यह सब व्रतों से उत्तम व्रत है. इस विजया एकादशी के महात्म्य के श्रवण व पठन से समस्त पाप नाश को प्राप्त हो जाते हैं. भयंकर शत्रुओं से जब आप घिरे हों और पराजय सामने खड़ी हो उस विकट स्थिति में विजया नामक एकादशी आपको विजय दिलाने की क्षमता रखती है.

विजया एकादशी व्रत कथा! (Vijaya Ekadashi Vrat Katha)
एक समय देवर्षि नारदजी ने जगत् पिता ब्रह्माजी से कहा महाराज! आप मुझसे फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी विधान का कहिए. ब्रह्माजी कहने लगे कि हे नारद! विजया एकादशी का व्रत पुराने तथा नए पापों को नाश करने वाला है. इस विजया एकादशी की विधि मैंने आज तक किसी से भी नहीं कही. यह समस्त मनुष्यों को विजय प्रदान करती है. त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम रामचंद्रजी जो विष्णु के अंशावतार थे, जब उनको 14 वर्ष का वनवास हो गया, तब वे श्री लक्ष्मण तथा सीताजी ‍सहित पंचवटी में निवास करने लगे. वहां पर दुष्ट लंकापित रावण ने जब माता सीता का हरण ‍किया तब इस समाचार से श्री रामचंद्रजी और भाई लक्ष्मण बहुत व्याकुल हो गए और माता सीता की खोज में चल दिए.

घूमते-घूमते जब वे मरणासन्न जटायु के पास पहुंचे तब जटायु उन्हें सीताजी का वृत्तांत सुनाकर स्वर्गलोक चला गया. कुछ आगे जाकर उनकी सुग्रीव से मित्रता हुई और राजा बालि का वध किया. हनुमानजी ने लंका में जाकर सीताजी खोज निकाला और उनसे रामचंद्रजी और सुग्रीव की‍ मित्रता का वर्णन किया. वहां से लौटकर हनुमानजी ने भगवान राम के पास आकर सब समाचार कहे. रामचंद्रजी ने वानर सेना सहित सुग्रीव की संपत्ति से लंका को प्रस्थान किया. जब श्री रामचंद्रजी समुद्र के किनारे पहुंचे तब उन्होंने मगरमच्छ आदि से युक्त उस अगाध समुद्र को देखकर लक्ष्मणजी से कहा कि इस समुद्र को हम किस प्रकार से पार करेंगे.

श्री लक्ष्मण ने कहा हे पुराण पुरुषोत्तम, आप आदिपुरुष हैं, सब कुछ जानते हैं. यहां से आधा योजन दूर पर कुमारी द्वीप में वकदाल्भ्य नाम के मुनि रहते हैं. उन्होंने अनेक ब्रह्मा देखे हैं, आप उनके पास जाकर इसका उपाय पूछिए. लक्ष्मणजी के इस प्रकार के वचन सुनकर श्री रामचंद्रजी वकदाल्भ्य ऋषि के पास गए और उनको प्रमाण करके बैठ गए. मुनि ने भी उनको मनुष्य रूप धारण किए हुए पुराण पुरुषोत्तम समझकर उनसे पूछा कि हे राम! आपका आना कैसे हुआ? रामचंद्रजी कहने लगे कि हे ऋषे! मैं अपनी सेना ‍सहित यहां आया हूँ और राक्षसों को जीतने के लिए लंका जा रहा हूं. आप कृपा करके समुद्र पार करने का कोई उपाय बतलाइए. मैं इसी वजह आपके पास आया हूं.

वकदाल्भ्य ऋषि बोले कि हे राम! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी का उत्तम व्रत करने से निश्चय ही आपकी विजय होगी, साथ ही आप समुद्र भी पार कर लेंगे. इस व्रत की विधि यह है कि दशमी के दिन स्वर्ण, चांदी, तांबा या मिट्‍टी का एक घड़ा बनाएं. उस घड़े को जल से भरकर तथा पांच पल्लव रख वेदिका पर स्थापित करें. उस घड़े के नीचे सतनजा और ऊपर जौ रखें. उस पर श्रीनारायण भगवान की स्वर्ण की मूर्ति स्थापित करें. एका‍दशी के दिन स्नानादि से निवृत्त होकर धूप, दीप, नैवेद्य, नारियल आदि से भगवान की पूजा करें. उसके बाद घड़े के सामने बैठकर दिन व्यतीत करें ‍और रात को भी उसी प्रकार बैठे रहकर जागरण करें. द्वादशी के दिन नित्य नियम से निवृत्त होकर उस घड़े को ब्राह्मण को दे दें.

हे राम! अगर तुम भी इस व्रत को सेनापतियों सहित करोगे तो तुम्हारी विजय अवश्य होगी. श्री रामचंद्रजी ने ऋषि के कथनानुसार इस व्रत को किया और इसके प्रभाव से दैत्यों पर विजय पाई. अत: हे राजन्! जो कोई मनुष्य विधिपूर्वक इस व्रत को करेगा, दोनों लोकों में उसकी अवश्य विजय होगी. श्री ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा था कि हे पुत्र! जो कोई इस व्रत के महात्म्य को पढ़ता या सुनता है, उसको वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है.

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