Ramadan 2026: किस दिन रखा जाएगा पहला रोजा, रमजान के क्या-क्या होते हैं नियम, कितना कठिन है 30 दिनों का त्योहार, जानें डिटेल
Ramadan 2026 Date: रमजान का नाम आते ही फिज़ा में एक अलग सी रूहानियत घुल जाती है. शाम की अज़ान, मस्जिदों में बढ़ती रौनक, सहरी के लिए जगती गलियां और इफ्तार की महकती दावतें यह महीना सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि एहसासों का सिलसिला है. हर साल की तरह इस बार भी लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है Ramadan 2026 में पहला रोजा कब रखा जाएगा और मीठी ईद किस दिन मनाई जाएगी? लखनऊ की ऐतिहासिक टीले वाली मस्जिद के शाही इमाम मौलाना सैय्यद फ़ज़लुल्ल मन्नान रहमानी ने चांद, सहरी, इफ्तार और ईद से जुड़ी तमाम जिज्ञासाओं पर विस्तार से जानकारी दी है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि 2026 का रमजान कब से शुरू हो सकता है और इसकी अहमियत क्या है.
कब रखा जाएगा पहला रोजा?
इस्लामिक हिजरी कैलेंडर के अनुसार रमजान नौवां महीना है. इसकी शुरुआत शाबान महीने की 29 या 30 तारीख को चांद दिखने पर निर्भर करती है. एक वेब साइट को मौलाना सैय्यद फ़ज़लुल्ल मन्नान रहमानी ने दी जानकारी के अनुसार, 2026 में संभावना है कि 19 फरवरी 2026 को पहला रोजा रखा जाए. हालांकि अंतिम निर्णय चांद दिखने के बाद ही लिया जाएगा.
यही वजह है कि रमजान की तारीखें हर साल ग्रेगोरियन कैलेंडर से लगभग 10-11 दिन पहले खिसक जाती हैं. कई परिवारों में चांद देखने की परंपरा आज भी उतनी ही उत्साह से निभाई जाती है. बच्चे छतों पर चढ़कर आसमान निहारते हैं और चांद की पहली झलक के साथ “रमजान मुबारक” की गूंज सुनाई देती है.
कब मनाई जाएगी ईद?
रमजान के पूरे 29 या 30 रोजों के बाद शव्वाल महीने की पहली तारीख को ईद-उल-फित्र मनाई जाती है, जिसे आम बोलचाल में मीठी ईद कहा जाता है. मौलाना रहमानी के अनुसार, यदि 19 फरवरी को पहला रोजा रखा जाता है तो 20 या 21 मार्च 2026 को ईद मनाई जा सकती है.
ईद का दिन सिर्फ जश्न का नहीं, बल्कि शुक्राने का दिन होता है. सुबह की नमाज, गले मिलना, सिवइयों की मिठास और रिश्तों की गर्माहट यह त्योहार सामाजिक एकता की खूबसूरत मिसाल है.
रमजान की खास रातें और अलविदा जुमा
शबे कद्र का महत्व
रमजान के आखिरी अशरे की रातों को बेहद खास माना जाता है. खासकर 21वीं, 23वीं, 25वीं, 27वीं और 29वीं शब को लोग देर रात तक इबादत करते हैं.
शबे कद्र की रात को “हजार महीनों से बेहतर” बताया गया है. मस्जिदों में विशेष नमाज अदा की जाती है, लोग कुरान की तिलावत करते हैं और दुआओं में मशगूल रहते हैं.
अलविदा की नमाज
रमजान का आखिरी शुक्रवार ‘अलविदा जुमा’ कहलाता है. इस दिन मस्जिदों में भारी भीड़ होती है. लोग इसे पूरे महीने की इबादत का खास मुकाम मानते हैं.
सहरी और इफ्तार: रोजे की रूह
सहरी क्या है?
रोजा रखने से पहले फज्र की नमाज से पहले जो भोजन किया जाता है, उसे सहरी कहते हैं. यह सिर्फ खाना नहीं, बल्कि नीयत का हिस्सा है.
अक्सर घरों में सहरी के वक्त अलग ही रौनक होती है. कोई पराठे सेंक रहा होता है, तो कहीं खिचड़ी या फल तैयार किए जाते हैं. माना जाता है कि सहरी में बरकत होती है और यह पूरे दिन की ऊर्जा का आधार बनती है.
इफ्तार क्या है?
सूर्यास्त के समय मगरिब की अजान के साथ रोजा खोला जाता है, जिसे इफ्तार कहते हैं. परंपरा है कि खजूर और पानी से रोजा खोला जाए.
इफ्तार के समय का नज़ारा अलग ही होता है. मस्जिदों और घरों में दरी बिछी होती है, सामने फल, पकौड़े और शरबत सजे रहते हैं. अजान होते ही सब एक साथ दुआ पढ़ते हैं यह पल सादगी और संतोष का प्रतीक होता है.
रमजान में जकात का महत्व
रमजान को रहमत और नेकी का महीना कहा जाता है. इस दौरान जकात देना विशेष महत्व रखता है.
मौलाना रहमानी के अनुसार, अगर किसी के पास निर्धारित संपत्ति है तो उसे उसका एक निश्चित हिस्सा जरूरतमंदों को देना चाहिए. उदाहरण के तौर पर, यदि किसी के पास 1000 रुपये हैं तो उसे 250 रुपये जकात के रूप में देना चाहिए. इसका मकसद समाज में बराबरी और सहानुभूति को बढ़ावा देना है. यही कारण है कि रमजान में दान-पुण्य की भावना और अधिक मजबूत हो जाती है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


