Ram Setu Mystery: कैसे डूबा राम सेतु? रोचक है इसका इतिहास और लेकिन उलझी है विज्ञान की कहानी, जानें क्या कहते हैं धार्मिक ग्रंथ?
Ram Setu Mystery: पहली नज़र में यह बस समुद्र के बीच उभरी रेत और चट्टानों की लड़ी लगती है, मगर करोड़ों लोगों के लिए यह आस्था, इतिहास और जिज्ञासा का संगम है. रामेश्वरम से श्रीलंका तक फैली इस शृंखला को लोग राम सेतु कहते हैं. बचपन से सुनते आए कि यह वही पुल है जिसे भगवान राम की सेना ने लंका पहुंचने के लिए बनाया था, लेकिन सवाल आज भी हवा में तैरता है, अगर पत्थर पानी पर तैरते थे, तो यह संरचना अब समुद्र के भीतर क्यों दिखती है? क्या यह सच में मानव-निर्मित था, या प्रकृति का खेल? पुराणों की कथाओं से लेकर सैटेलाइट तस्वीरों तक, इस सेतु ने धार्मिक बहस, राजनीतिक चर्चा और वैज्ञानिक पड़ताल-तीनों को एक साथ खड़ा कर दिया है. यही वजह है कि राम सेतु की कहानी आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करती है.
आस्था की नजर से राम सेतु
वाल्मीकि रामायण में वर्णन मिलता है कि श्रीराम ने वानर सेना की मदद से समुद्र पर पुल बनवाया था. कथा कहती है कि नल और नील ने ऐसे पत्थरों का इस्तेमाल किया जो पानी पर तैरते थे. कई लोग आज भी रामेश्वरम के आसपास मिलने वाले हल्के पत्थरों को इसी कहानी से जोड़ते हैं.
धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख
रामायण के अलावा कुछ पुराणों और लोककथाओं में भी इस सेतु का जिक्र आता है. दक्षिण भारत के कई मंदिरों में इसे दिव्य निर्माण माना जाता है. स्थानीय लोग बताते हैं कि पुराने समय में यहां पानी कम गहरा था और लोग पैदल या नाव से पार के टापुओं तक जाते थे.
भूगोल और सैटेलाइट की तस्वीरें
आधुनिक दौर में यह मुद्दा तब ज्यादा चर्चा में आया जब सैटेलाइट तस्वीरों में भारत और श्रीलंका के बीच उथली चट्टानों की लंबी श्रृंखला साफ दिखी. भूगोल के जानकार इसे “शोल्स” यानी रेतीली पट्टियों और चूना-पत्थर की परतों का प्राकृतिक समूह बताते हैं.
वैज्ञानिक क्या कहते हैं?
कुछ भूवैज्ञानिकों के अनुसार यह इलाका हजारों साल में समुद्री धाराओं, रेत जमने और प्रवाल संरचनाओं से बना हो सकता है. वहीं कुछ शोधकर्ताओं ने यह संभावना भी जताई कि कभी यहां जमीन का जुड़ा हुआ भाग रहा होगा, जो बाद में समुद्र-स्तर बढ़ने से डूब गया. हालांकि अब तक ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण सामने नहीं आया जो इसे निश्चित रूप से मानव-निर्मित साबित करे.
“डूबने” की कहानी कहां से आई?
लोकमान्यताओं में कहा जाता है कि युद्ध के बाद विभीषण के अनुरोध पर श्रीराम ने सेतु को निष्क्रिय कर दिया, ताकि भविष्य में कोई आक्रमण न हो. दूसरी ओर, प्राकृतिक कारण भी बताए जाते हैं-तूफान, चक्रवात और समुद्री कटाव. इतिहास में दर्ज है कि इस क्षेत्र में भीषण तूफानों ने कई बार तटीय भूभाग बदल दिए. 1964 का रामेश्वरम चक्रवात इसका उदाहरण है, जिसने धनुषकोडी को लगभग उजाड़ दिया था. ऐसे में यह मानना गलत नहीं कि सदियों में समुद्र की गहराई और भू-आकृति बदली होगी.
लोगों के अनुभव और स्थानीय नजरिया
रामेश्वरम आने वाले श्रद्धालु आज भी नाव से उन उथले हिस्सों तक जाते हैं जहां पानी कमर तक आता है. मछुआरे बताते हैं कि कुछ जगह समुद्र अचानक उथला हो जाता है, जैसे नीचे कोई कठोर सतह हो. पर्यटन गाइड इसे “राम का पुल” कहकर दिखाते हैं, जबकि वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक संरचना कहते हैं. सच यह है कि आम आदमी के लिए यह सिर्फ भूगोल का सवाल नहीं, भावनाओं का विषय भी है. आस्था और विज्ञान यहां आमने-सामने नहीं, बल्कि साथ-साथ चलते नजर आते हैं.
रहस्य अब भी बाकी
राम सेतु को लेकर अंतिम सच अभी भी धुंध में है. धार्मिक दृष्टि इसे दिव्य मानती है, जबकि विज्ञान इसे प्राकृतिक प्रक्रिया का नतीजा बताता है. शायद भविष्य की नई तकनीकें इस पहेली की और परतें खोलें. तब तक यह सेतु इतिहास, आस्था और खोज-तीनों के बीच खड़ा एक जीवंत प्रतीक बना रहेगा.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


