Phalguna Amavasya 2026: 1 भूल पड़ेगी भारी! क्या करें, क्या बिल्कुल न करें, जानें फाल्गुन अमावस्या के जरूरी नियम
Phalguna Amavasya 2026: कई लोग अमावस्या को सिर्फ एक तिथि मानकर निकल जाते हैं, लेकिन हिंदू पंचांग में इसकी अपनी अलग आध्यात्मिक धड़कन होती है. खासकर फाल्गुन मास की अमावस्या जिसे पितरों की शांति, आत्ममंथन और दान-पुण्य के लिए बेहद शुभ माना जाता है. इस दिन सुबह से ही कई घरों में स्नान-दान, तर्पण और पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं. बुजुर्ग अक्सर समझाते हैं कि यह दिन सिर्फ कर्मकांड का नहीं, बल्कि भीतर झांकने का अवसर है. फाल्गुन अमावस्या 2026 को लेकर इस बार लोगों में खास उत्साह है. मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की तैयारी चल रही है. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि इस दिन क्या करना शुभ माना गया है और किन बातों से बचना चाहिए, ताकि पुण्य का फल पूर्ण रूप से मिल सके. इस विषय में अधिक जानकारी दे रहे हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा.
कब मनाई जा रही फाल्गुन अमावस्या?
वैदिक पंचाग के मुताबिक इस साल फाल्गुन मास की अमावस्या तिथि 16 फरवरी यानी कल शाम 05 बजकर 34 पर आरंभ हो रही है. साथ ही इस तिथि का अंत अगले दिन 17 फरवरी को शाम 05 बजकर 31 मिनट पर होगा ऐसे में उदयातिथि के अनुसार, फाल्गुन मास की अमावस्या इस साल 17 फरवरी को मनाई जाएगी
फाल्गुन अमावस्या का धार्मिक महत्व
फाल्गुन मास की अमावस्या को पितृ तर्पण और दान के लिए विशेष फलदायी माना जाता है. मान्यता है कि इस दिन किए गए तर्पण से पितृ प्रसन्न होते हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं. ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग नदी या तालाब किनारे तिल और जल से तर्पण करते नजर आते हैं.
धार्मिक ग्रंथों में इसे आत्मशुद्धि का भी दिन बताया गया है. होली से ठीक पहले पड़ने वाली यह अमावस्या मानो पुराने नकारात्मक भावों को छोड़ने और नई शुरुआत की तैयारी का संकेत देती है.
इस दिन क्या करें?
सुबह स्नान और तर्पण
अमावस्या के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना शुभ माना जाता है. यदि संभव हो तो गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करें, अन्यथा घर पर ही गंगाजल मिलाकर स्नान किया जा सकता है. इसके बाद तिल और जल से पितरों का तर्पण करें.
दान-पुण्य का महत्व
इस दिन काले तिल, वस्त्र, अन्न या जरूरतमंदों को भोजन दान करना शुभ माना गया है. कई परिवारों में खिचड़ी बनाकर गरीबों में बाँटी जाती है. कहा जाता है कि सच्चे मन से किया गया दान कई गुना फल देता है.
दीपदान और पीपल पूजा
शाम के समय पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना भी शुभ माना जाता है. यह परंपरा कई घरों में पीढ़ियों से निभाई जा रही है. मान्यता है कि इससे पितृ दोष शांत होता है और घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है.
इस दिन क्या न करें?
विवाद और क्रोध से बचें
अमावस्या का दिन मानसिक शांति के लिए होता है. ऐसे में झगड़ा, अपशब्द या क्रोध से बचना चाहिए. कई लोग मानते हैं कि इस दिन नकारात्मक ऊर्जा जल्दी प्रभाव डालती है.
नकारात्मक विचारों से दूरी
किसी के लिए बुरा सोचना या ईर्ष्या करना भी इस दिन अशुभ माना जाता है. यह आत्मचिंतन का समय है, इसलिए सकारात्मक सोच बनाए रखना बेहतर है.
तामसिक भोजन से परहेज
लहसुन-प्याज, मांस-मदिरा या अत्यधिक मसालेदार भोजन से बचना चाहिए. सादा और सात्विक भोजन करना ही बेहतर माना गया है.
बदलते समय में परंपरा का अर्थ
आज के दौर में कई युवा इन परंपराओं को पुराने जमाने की बात समझते हैं. लेकिन अगर गहराई से देखें तो इन नियमों के पीछे व्यावहारिक सोच भी छिपी है. जैसे दान से सामाजिक संतुलन बनता है, आत्मचिंतन से मानसिक शांति मिलती है और संयमित भोजन से शरीर को आराम मिलता है.
शहरों में रहने वाले लोग भले नदी तक न जा पाएं, लेकिन घर पर ही कुछ मिनट शांत बैठकर अपने पूर्वजों को याद कर सकते हैं. कई परिवार ऑनलाइन पूजा या पंडित से वीडियो कॉल के जरिए तर्पण करवाने लगे हैं. परंपरा रूप बदल सकती है, भावना नहीं.
फाल्गुन अमावस्या सिर्फ एक तिथि नहीं, बल्कि एक अवसर है रुककर सोचने का, पितरों को स्मरण करने का और अपने भीतर की नकारात्मकता को छोड़ने का. क्या करें और क्या न करें, यह जानना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है सच्ची भावना और श्रद्धा.


