Makar Sankanti History: सूर्य देव की पूजा से कृषि उत्सव तक, कैसे शुरू हुआ खुशियों का यह पावन पर्व

Makar Sankanti History: सूर्य देव की पूजा से कृषि उत्सव तक, कैसे शुरू हुआ खुशियों का यह पावन पर्व

Makar Sankanti History: भारत में त्योहार केवल खुशियां मनाने का मौका नहीं होते, बल्कि ये हमारे जीवन, परंपरा और प्रकृति से भी हमें जोड़ते हैं. हर त्योहार का अपना एक खास इतिहास और कहानी होती है, जो हमें हमारे पूर्वजों की सोच, संस्कृति और जीवनशैली के बारे में बताती है. मकर संक्रांति भी ऐसा ही एक त्योहार है. यह केवल एक धार्मिक या पारंपरिक दिन नहीं है, बल्कि सूर्य की गति और कृषि से जुड़ा एक महत्वपूर्ण दिन है. मकर संक्रांति का जिक्र प्राचीन वेदों और पुराणों में मिलता है. इसे मुख्य रूप से सूर्य देवता के सम्मान में मनाया जाता है. यह दिन बताता है कि सूर्य राशि मकर में प्रवेश कर रहा है और अब दिन बड़े होने लगते हैं. पुराने समय में किसान इस दिन को अपने खेतों में नई फसल की शुरुआत का संकेत मानते थे. यही कारण है कि मकर संक्रांति हर राज्य में अलग ढंग से मनाई जाती है, लेकिन मूल भावना एक ही रहती है -प्रकृति का सम्मान, मेहनत की कदर और खुशियों का आदान-प्रदान. इस दिन को विशेष बनाने के लिए देशभर में पतंग उड़ाने की परंपरा है, हलवा-खिचड़ी का प्रसाद तैयार किया जाता है और लोग एक-दूसरे को तिल और गुड़ का उपहार देते हैं. बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी इस त्योहार में शामिल होते हैं और पारिवारिक मेल-जोल का आनंद लेते हैं. मकर संक्रांति का इतिहास हमें बताता है कि यह केवल एक धार्मिक दिन नहीं, बल्कि जीवन, कृषि और सूर्य के चक्र के साथ जुड़ा एक समय है.

मकर संक्रांति का इतिहास और उसका महत्व
-मकर संक्रांति का जिक्र सबसे पहले प्राचीन भारतीय ग्रंथों में मिलता है. वैदिक काल में इसे सूर्य की पूजा के रूप में माना गया. सूर्य देवता को जीवन का स्रोत और कृषि का रक्षक माना जाता था. किसान इस दिन अपने खेतों में नई फसल की शुरुआत करते और सूर्य देव से अच्छे मौसम और भरपूर फसल की प्रार्थना करते. मकर संक्रांति का दिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के कारण भी खास होता है. इसे उत्तरायण के रूप में जाना जाता है. पुराणों में इसे पुण्य और नई शुरुआत का प्रतीक कहा गया है. इस दिन किए गए अच्छे काम और दान को बहुत ज्यादा फलदायक माना जाता है. यही कारण है कि कई लोग इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को तिल, गुड़ और अनाज दान करते हैं. कई ऐतिहासिक संदर्भ भी मकर संक्रांति से जुड़े हुए हैं. कहते हैं कि राजा और सामंत इस दिन अपने प्रजा को भोजन और कपड़े बांटते थे. अलग-अलग राज्यों में इस त्योहार का अपना तरीका है. गुजरात और महाराष्ट्र में लोग बड़े उत्साह से पतंग उड़ाते हैं. पंजाब और हरियाणा में खिचड़ी और लड्डू बनाने की परंपरा है. तमिलनाडु में यह थाई पोन्गल के रूप में मनाया जाता है. हर राज्य में अलग-अलग नाम और तरीके हैं, लेकिन सूर्य देव की पूजा और खुशियों का आदान-प्रदान सभी जगह समान है.

मकर संक्रांति से जुड़ी प्रमुख परंपराएं
1. पतंग उड़ाना: खासकर पश्चिम और उत्तर भारत में लोग खुले आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ाते हैं. यह सिर्फ खेल नहीं, बल्कि सूर्य की ऊर्जावान किरणों का प्रतीक भी माना जाता है.
2. तिल और गुड़ का प्रसाद: मकर संक्रांति के दिन तिल और गुड़ का खास महत्व है. तिल और गुड़ खाने से शरीर को गर्मी मिलती है और ये परंपरा सौभाग्य और मित्रता को बढ़ाने के रूप में भी जानी जाती है.

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3. स्नान और दान: कई लोग इस दिन गंगा, यमुना और अन्य पवित्र नदियों में स्नान करते हैं. साथ ही जरूरतमंदों को दान देने से पुण्य की प्राप्ति होती है.
4. खिचड़ी और हलवा: मकर संक्रांति का खाना भी खास होता है. हर राज्य में अपने तरीके से व्यंजन बनते हैं, जो त्योहार की खुशियों को और बढ़ा देते हैं.

मकर संक्रांति का आध्यात्मिक महत्व
मकर संक्रांति केवल भौतिक गतिविधियों तक सीमित नहीं है. यह आत्मा और जीवन के बदलाव का प्रतीक भी है. सूर्य की नई दिशा में यात्रा हमें यह याद दिलाती है कि हर कठिनाई के बाद उजाला और नई शुरुआत होती है. लोग इस दिन ध्यान और प्रार्थना करते हैं, अपने जीवन में नकारात्मकता को दूर करने और सकारात्मक ऊर्जा को अपनाने के लिए.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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