Magh Mela 2026: कौन हैं नागा साधु दिगंबर अजय गिरि? 11 हजार रुद्राक्ष की माला और तन पर भस्म, माघ मेले में बने आकर्षण का केंद्र
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माघ मास में हजारों लाखों की संख्या में साधु-संत प्रयागराज पहुंचते हैं और कल्पवास भी करते हैं. इस बार माघ मेले में 11 हजार रुद्राक्ष की माला और तन पर भस्म लगाए नागा साधु पहुंचे हैं, जो वहीं रहकर साधना में लीन हैं. इस रूप को धारण करने के लिए उन्होंने अपना पिंड दान किया और फिर साधु बनने की राह पर चले हैं.
Magh Mela 2026: साल 2025 के महाकुंभ के बाद माघ मेला साल का सबसे बड़ा मेला बनकर उभरा है, जहां रोज हजारों की संख्या में श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाने के लिए पहुंच रहे हैं. माघ मेले के संगम तट पर आस्था का नया रूप भी देखने को मिल रहा है. साधु और संतों का जमावड़ा तटों पर स्नान कर अनुष्ठानों में लीन दिख रहा है, तो वहीं कुछ ऐसे तपस्वी भी दिखने को मिल रहे हैं, जो अपनी कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए माघ मेले का हिस्सा बने हैं. बताया जाता है कि माघ मेला केवल स्नान का पर्व नहीं, बल्कि अहंकार त्याग, साधु-संत संग, आत्मशुद्धि, जीवन की दिशा परिवर्तन का अवसर है. आइए जानते हैं 11 हजार रुद्राक्ष की माला और तन पर भस्म लगाए नागा साधु के बारे में और माघ मास का महत्व…

हम बात कर रहे हैं 11,000 रुद्राक्ष की माला पहने एक नागा साधु की, जो निरंजनी पंचायती अखाड़ा के दिगंबर अजय गिरि हैं. माघ मेले में उन्हें सिर से लेकर गले तक में लंबी-लंबी रुद्राक्ष की माला को धारण करते हुए देखा गया. उन्होंने बताया कि मैं ज्यादातर केदारनाथ में रहता हूं और वाराणसी वह स्थान है, जहां भगवान शिव अवतरित हुए थे. काशी वह नगर है जहां मोक्ष प्राप्त होता है, और ऐसा माना जाता है कि यहां मरने वालों को मोक्ष प्राप्त होता है. माघ मेले के दौरान, देश भर के सभी क्षेत्रों से श्रद्धालु भजन सुनने, गाने और आध्यात्मिक साधनाओं में भाग लेने के लिए एकत्रित होते हैं.

11,000 रुद्राक्ष की माला पर बात करते हुए दिगंबर अजय गिरि ने बताया कि 26 साल पहले उन्होंने संन्यास लिया था और कुछ साल पहले ही 11,000 रुद्राक्ष को धारण किया है. शिव पुराण में भी इस बात का जिक्र है कि जो 11,000 रुद्राक्ष की माला धारण करता है, वह शिव के लिए बहुत प्रिय होता है. इस रूप को धारण करने के लिए उन्होंने अपना पिंड दान किया और फिर साधु बनने की राह पर चले हैं.
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शरीर पर रमी भस्म को लेकर साधु ने कहा कि भस्म शिव को प्रिय है और भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए रुद्राक्ष और भस्म दोनों ही अनिवार्य हैं. भस्म हमेशा याद दिलाती है कि जन्म और मृत्यु जीवन का सबसे बड़ा सत्य है. माघ मेले में नागा साधु और अघोरी बाबा श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं.

माघ मेला भारत की सनातन परंपरा का एक अत्यंत पवित्र और तपोमय पर्व है, जो मुख्यतः प्रयागराज (त्रिवेणी संगम) में माघ मास भर आयोजित होता है. इसे कल्पवास का महापर्व भी कहा गया है. जब माघ मास (पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक) में लाखों श्रद्धालु गंगा–यमुना–सरस्वती के संगम पर स्नान, दान, जप, तप और व्रत करते हैं, उसी आध्यात्मिक आयोजन को माघ मेला कहा जाता है. पद्मपुराण और मत्स्यपुराण में माघ स्नान को सहस्र अश्वमेध यज्ञ के समान फलदायी बताया गया है.

शास्त्रों के अनुसार, माघ मास में प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में गंगा स्नान जन्म-जन्मांतर के पापों का नाश करता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है. वहीं इस मास में कल्पवास भी किया जाता है और इस दिन कई नियमों का पालन किया जाता है. कल्पवास के दौरान संयमित जीवन, भूमि शयन, एक समय सात्त्विक भोजन, ब्रह्मचर्य और विष्णु नाम जप किया जाता है. कहा गया है कि एक माघ मास में कल्पवास का फल कई वर्षों की तपस्या के बराबर मिलता है.


