Hindu Nav Yarsh 2026 में होंगे 13 महीने, इस साल दो होंगे ज्येष्ठ मास, श्रीहरि का संबंध और सभी महत्वपूर्ण जानकारी
Hindu Nav Yarsh 2026 Vikram Samvat 2083: जहां अंग्रेजी कैलेंडर में नया साल जनवरी में शुरू होता है, वहीं हिंदू परंपरा में चैत्र मास से नए साल की शुरुआत होती है. हिंदू धर्म में समय की गणना विक्रम संवत के अनुसार होती है. हिंदू वर्ष की शुरुआत चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा तिथि से होती है. इस साल 19 मार्च 2026 दिन गुरुवार को यह तिथि पड़ रही है. आने वाला विक्रम संवत 2083 का खास होने वाला है, क्योंकि इसमें अधिक मास (अतिरिक्त महीना) शामिल होगा, जिससे हिंदू नववर्ष 13 महीनों का होने वाला है, यह एक दुर्लभ खगोलीय और पंचांग संबंधी घटना है. विशेषज्ञों के अनुसार, विक्रम संवत 2083 में अधिक मास के कारण एक अतिरिक्त महीना होगा, जिसे मलमास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है. आइए जानते हैं अधिकमास के बारे में और किस तरह इस साल 13 महीने का होने वाला है हिंदू नववर्ष…
ज्येष्ठ में होगा अधिक मास
इस वर्ष अधिक मास ज्येष्ठ माह में आने वाला है. ज्येष्ठ अधिक मास 17 मई 2026 से शुरू होकर 15 जून 2026 तक चलेगा. इसके कारण आने वाले व्रत और त्योहार लगभग 15 से 20 दिन आगे बढ़ जाएंगे. वहीं विक्रम संवत 2083 की शुरुआत 19 मार्च 2026 को होगी, जो गुड़ी पड़वा और चैत्र (वसंत) नवरात्रि के साथ होगी. चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि से चैत्र नवरात्रि की शुरुआत भी होती है. चैत्र नवरात्रि भी 19 मार्च 2026 से शुरू होंगे और 27 मार्च 2026 को समापन होगा.
दुर्लभ 13 महीनों का हिंदू वर्ष 2026
अधिक मास के कारण हिंदू नववर्ष में 12 नहीं बल्कि 13 महीने होने जा रहे हैं. मान्यता है कि भगवान विष्णु ने इस अतिरिक्त महीने को अपना नाम दिया, जिससे इसका आध्यात्मिक महत्व अन्य महीनों से अधिक हो गया. जब सूर्य और चंद्रमा की गति असंतुलित हो जाती है और पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ दिया जाता है, तो केवल वर्ष आगे नहीं बढ़ता, बल्कि समय का अर्थ ही बदल जाता है. इस अतिरिक्त महीने को मलमास, अधिक मास या पुरुषोत्तम मास कहा जाता है. मान्यता है कि यह समय भगवान विष्णु की कृपा से विशेष रूप से शुभ और आध्यात्मिक उन्नति के लिए उत्तम होता है.

अधिकमास का पौराणिक महत्व
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, जब यह अतिरिक्त महीना पहली बार अस्तित्व में आया तो कोई भी देवता इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था. तब भगवान विष्णु ने इसे अपने संरक्षण में लिया और इसे पुरुषोत्तम मास नाम दिया. तभी से इसे अत्यंत पवित्र माना जाता है. माना जाता है कि इस समय किए गए धार्मिक कार्य, पुण्य, शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्रदान करते हैं. इस मास में किया गया कोई भी शुभ कार्य किसी अन्य मास से ज्यादा शुभ फल देता है.
पंचांग के अनुसार, अधिक मास 17 मई से 15 जून 2026 तक रहने वाला है. यह पूरा समय तप, जप, ध्यान, भक्ति और दान के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है. अधिक मास के पहले दिन व्रत रखने से पापों का नाश होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है.

एक वर्ष में दो ज्येष्ठ महीने
विक्रम संवत 2083 में एक अनोखी घटना होगी, जिसमें दो ज्येष्ठ महीने होने जा रहे हैं…
एक सामान्य ज्येष्ठ माह, दूसरा अधिक ज्येष्ठ (पुरुषोत्तम मास) अतिरिक्त महीने के कारण, ज्येष्ठ लगभग 58-59 दिनों तक चलेगा. इस दौरान दोनों महीने आंशिक रूप से एक-दूसरे से मिलेंगे.
अधिक ज्येष्ठ मास
शुरुआत: 17 मई 2026
समाप्ति: 15 जून 2026
सामान्य ज्येष्ठ मास
शुरुआत: 22 मई 2026
समाप्ति: 29 जून 2026
यह ओवरलैपिंग खगोलीय और पंचांग की दृष्टि से इस वर्ष को विशेष रूप से दुर्लभ बनाती है.

अधिकमास में शुभ कार्यों पर रोक
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, अधिकमास या मलमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण, भूमि पूजन या नया व्यवसाय शुरू करने जैसे शुभ कार्यों से बचना चाहिए. माना जाता है कि इस समय किए गए शुभ कार्यों का फल नहीं मिलता, क्योंकि ग्रहों की स्थिति अनुकूल नहीं मानी जाती. इसीलिए, अधिक मास की पूरी अवधि में बड़े जीवन संस्कार पारंपरिक रूप से टाल दिए जाते हैं.
अधिक मास क्यों आता है?
मलमास का आना सौर और चंद्र कैलेंडर के अंतर के कारण होता है. सौर वर्ष 365 दिनों का होता है, जबकि चंद्र वर्ष लगभग 354-355 दिनों का होता है. यह अंतर समय के साथ बढ़ता जाता है और लगभग 32 महीने 16 दिन बाद इतना अधिक हो जाता है कि उसे संतुलित करना जरूरी हो जाता है. इस अंतर को संतुलित करने और त्योहारों के मौसम के अनुसार बने रहने के लिए पंचांग में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है. इस अतिरिक्त महीने को ही अधिक मास कहा जाता है.

अधिक मास क्यों जरूरी है?
अधिकांश हिंदू त्योहार और व्रत चंद्र तिथियों पर आधारित होते हैं. अगर समय-समय पर अधिक मास ना जोड़ा जाए तो त्योहार मौसम के अनुसार बदलते रहेंगे, जिससे दिवाली बारिश में और होली सर्दियों में आ सकती हैं. ऐसी गड़बड़ी से बचने के लिए प्राचीन विद्वानों ने अधिक मास की व्यवस्था बनाई. यह गणितीय दृष्टि से जरूरी है, लेकिन धार्मिक रूप से इसे अत्यंत पवित्र और आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली समय माना जाता है.


