Extra Marital Affair: शादी से पहले जरूर जांच लें कुंडली, वरना वैवाहिक जीवन में आ सकता है तूफान! ये ग्रह कराते हैं शादीशुदा जिंदगी में तीसरे की एंट्री!

Extra Marital Affair: शादी से पहले जरूर जांच लें कुंडली, वरना वैवाहिक जीवन में आ सकता है तूफान! ये ग्रह कराते हैं शादीशुदा जिंदगी में तीसरे की एंट्री!

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Extra Marital Affair: शादी सिर्फ दो लोगों का साथ नहीं, दो परिवारों की उम्मीदों का संगम होती है. लेकिन जब रिश्तों के बीच अचानक “तीसरे” की आहट सुनाई देती है, तो सबसे मजबूत बंधन भी दरकने लगते हैं. आजकल वैवाहिक जीवन में बढ़ती दूरियां और विवाहेतर संबंधों की खबरें आम हो चुकी हैं. ज्योतिष शास्त्र मानता है कि व्यक्ति का स्वभाव, उसकी इच्छाएं और निर्णय लेने की प्रवृत्ति ग्रहों की स्थिति से प्रभावित होती है. अगर शादी से पहले कुंडली का गहराई से अध्ययन किया जाए, तो कुछ संभावित जोखिमों को समझा जा सकता है. आइए विस्तार से जानते हैं भोपाल निवासी ज्योतिषी एवं वास्तु सलाहकार पंडित हितेंद्र कुमार शर्मा से.

गुण मिलान से आगे की सच्चाई हिंदू परंपरा में विवाह से पहले कुंडली मिलान आम बात है. 36 गुणों में से 18 या उससे अधिक गुण मिल जाएं तो रिश्ता “उपयुक्त” मान लिया जाता है. लेकिन ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि सिर्फ गुण मिलान काफी नहीं. यह स्वास्थ्य, स्वभाव और पारिवारिक तालमेल का संकेत देता है, पर वैवाहिक निष्ठा या मानसिक स्थिरता का पूरा चित्र नहीं दिखाता. आज के दौर में, जब रिश्तों पर सोशल मीडिया, बदलती जीवनशैली और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का असर है, तब सिर्फ पारंपरिक मिलान से आगे बढ़कर कुंडली का विस्तृत विश्लेषण जरूरी माना जा रहा है.

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ग्रहों की भूमिका: स्वभाव और आकर्षण का खेल शुक्र और राहु का मेल ज्योतिष में शुक्र को प्रेम, सौंदर्य और भोग का कारक माना जाता है. वहीं राहु को भ्रम, असंतोष और सीमाएं तोड़ने वाला ग्रह कहा गया है. यदि किसी की कुंडली में शुक्र और राहु एक ही भाव में हों या एक-दूसरे पर दृष्टि डाल रहे हों, तो व्यक्ति में असामान्य आकर्षण और जोखिम लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है. कई ज्योतिष विशेषज्ञ बताते हैं कि ऐसे लोग रिश्तों में जल्दी आकर्षित होते हैं, लेकिन स्थायित्व बनाए रखना उनके लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है. हालांकि यह जरूरी नहीं कि हर ऐसी स्थिति विवाहेतर संबंधों में बदले, पर प्रलोभन की संभावना अधिक मानी जाती है.

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मंगल और शुक्र की दृष्टि मंगल ऊर्जा, साहस और कामुकता का प्रतीक है. जब मंगल और शुक्र की परस्पर दृष्टि बनती है, तो व्यक्ति में तीव्र शारीरिक आकर्षण और आवेग बढ़ सकते हैं. यह संयोजन सकारात्मक भी हो सकता है जैसे दांपत्य जीवन में उत्साह लेकिन अगर अन्य ग्रह कमजोर हों, तो यही ऊर्जा गलत दिशा ले सकती है. ज्योतिषाचार्य अक्सर सलाह देते हैं कि ऐसे योग होने पर विवाह से पहले मानसिक परिपक्वता और पारिवारिक मूल्यों पर विशेष ध्यान देना चाहिए.

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सातवां और बारहवां भाव: रिश्तों का केंद्र सातवां भाव और वैवाहिक जीवन कुंडली का सातवां भाव विवाह और जीवनसाथी का प्रतिनिधित्व करता है. यदि इस भाव पर राहु या शनि का गहरा प्रभाव हो, तो वैवाहिक जीवन में असंतोष या दूरी आ सकती है. शनि देरी और ठंडापन लाता है, जबकि राहु असामान्य इच्छाएं जगा सकता है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति को लगता है कि उसकी भावनात्मक या शारीरिक जरूरतें पूरी नहीं हो रहीं. यही खालीपन कभी-कभी बाहरी संबंधों की ओर धकेल सकता है.

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बारहवां भाव और गुप्त इच्छाएं बारहवां भाव शारीरिक सुख और निजी जीवन से जुड़ा होता है. अगर इस पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो, तो व्यक्ति गुप्त आकर्षण या छिपे संबंधों की ओर झुक सकता है. हालांकि यह केवल संभावना है, अंतिम निर्णय व्यक्ति की समझ और संस्कार पर निर्भर करता है.

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चंद्रमा और मन की स्थिरता चंद्रमा मन का कारक है. अगर चंद्रमा कमजोर हो या राहु/केतु जैसे ग्रहों से प्रभावित हो, तो व्यक्ति का मन स्थिर नहीं रहता. वह जल्दी भावनात्मक रूप से जुड़ सकता है और उतनी ही जल्दी ऊब भी सकता है. कई मामलों में देखा गया है कि भावनात्मक खालीपन, संवाद की कमी और मानसिक असंतुलन विवाहेतर संबंधों का कारण बनते हैं सिर्फ ग्रह नहीं, बल्कि परिस्थितियां भी उतनी ही जिम्मेदार होती हैं.

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आठवां भाव: गुप्त जीवन के संकेत कुंडली का आठवां भाव रहस्यों और गुप्त गतिविधियों से जुड़ा है. यदि राहु यहां स्थित हो, तो व्यक्ति अपने निजी जीवन को छिपाकर रखने में माहिर हो सकता है. ऐसे लोग दोहरी जिंदगी जीने की प्रवृत्ति रख सकते हैं कम से कम ज्योतिष यही संकेत देता है. हालांकि विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि कुंडली चेतावनी देती है, निर्णय नहीं सुनाती. सही मार्गदर्शन, परामर्श और आत्मसंयम से कई नकारात्मक प्रभावों को संतुलित किया जा सकता है.

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क्या सिर्फ ग्रह जिम्मेदार हैं? यह सवाल भी अहम है. आधुनिक मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि रिश्तों में बेवफाई का कारण सिर्फ इच्छाएं नहीं, बल्कि संवाद की कमी, असंतोष, अहंकार और अवसर भी होते हैं. ज्योतिष इसे ग्रहों की भाषा में समझाता है, जबकि मनोविज्ञान इसे व्यवहार और परवरिश से जोड़ता है.

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