Bhishma Ashtami 2026: गंगापुत्र भीष्म, बाणों की शैया पर 2 महीने क्यों किया मौत का इंतजार? कैसे मिला इच्छा मृत्यु का वरदान
Bhishma Ashtami 2026 Katha In Hindi: गंगापुत्र भीष्म महाभारत के प्रभावशाली पात्रों में से एक थे. कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ तो पितामह भीष्म कौरवों की तरफ से लड़ रहे थे क्योंकि उन्होंने हस्तिनापुर के राजसिंहासन की रक्षा का प्रण लिया था. महाभारत के युद्ध में भीष्म को जब अर्जुन ने बाणों से छलनी कर दिया तो उनकी तत्कान मृत्यु नहीं हुई. वे बाणों की शैय्या पर करीब 2 माह तक लेटे रहे. उन्होंने अपनी मृत्यु का इंतजार 2 माह तक किया. उनको इच्छा मृत्यु का वरदान मिला था, वे जब चाहते, तभी उनके प्राण निकलते. उनकी मृत्यु माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को हुई थी, इसलिए उस तिथि को भीष्म अष्टमी होती है. पितामह भीष्म ने अपनी मृत्यु का 2 माह तक प्रतीक्षा क्यों की? उनको इच्छा मृत्यु का वरदान कैसे मिला?
महाभारत युद्ध के 10वें दिन अर्जुन ने भीष्म को बाणों से बेधा
महाभारत युद्ध में अर्जुन ने बाणों से भीष्म को छलनी कर दिया.
पितामह भीष्म बहुत ही पराक्रमी और साहसी योद्धा थे, युद्ध में उनको हराना असंभव था. पितामह भीष्म के आगे पांडवों की सेना टिक नहीं पा रही थी, वे अपने बाणों से तितर बितर कर देते. अर्जुन ने पितामह भीष्म से उनकी पराजय का रहस्य जानना चाहा तो उन्होंने बताया कि उनके सामने कोई स्त्री आ जाए तो वे उस पर अस्त्र नहीं उठाएंगे.
युद्ध के 10वें दिन पितामह भीष्म के सामने युद्ध के लिए शिखंडी को भेजा गया, शिखंडी को देखकर भीष्म ने अपने अस्त्र रख दिए. शिखंडी में स्त्री और पुरुष दोनों के गुण थे. इसी मौके का फायदा उठाकर अर्जुन ने उन पर हमला कर दिया. अुर्जन ने बाणों से भीष्म के शरीर को छलनी कर दिया. भीष्म उस रणभूमि में शरशय्या पर लेट गए.
भीष्म ने 2 माह तक क्यों की मृत्यु की प्रतीक्षा?

भीष्म बाणों की शैया पर 2 महीने तक लेटे रहे और प्राण त्यागने की प्रतीक्षा करते रहे.
जिस दिन पितामह भीष्म का शरीर बाणों से छलनी हुआ, उस दिन मार्गशीर्ष यानि अगहन माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि थी और सूर्य देव दक्षिणायन थे. दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि कहा जाता है. इस समय में कोई शुभ काम नहीं करते हैं. सूर्य के दक्षिणायन रहने पर किसी की मृत्यु होती है तो उसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती है, वह दोबारा जन्म लेता है, जन्म और मरण के चक्र से मुक्त नहीं हो पाता.

सूर्य के उत्तरायण होने पर भीष्म की आत्मा ने शरीर छोड़ दिया.
ऐसे ही सूर्य जब उत्तरायण रहते हैं और उस समय किसी की मृत्यु होती है तो उसकी आत्मा को मोक्ष मिल जाता है, वह जीवात्मा जन्म और मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है. उत्तरायण को देवताओं का दिन कहा जाता है. भीष्म को यह बात पता थी, वे दक्षिणायन में प्राण त्याग करके फिर जन्म और मरण के चक्र में नहीं फंसना चाहते थे. वे मोक्ष पाना चाहते थे, इस वजह से उन्होंने करीब 2 माह तक अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा की. सूर्य देव जब मकर राशि में प्रवेश किए तो उत्तरायण का प्रारंभ हुआ. माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भीष्म ने अपने प्राण त्याग दिए.
भीष्म को कैसे मिला इच्छा मृत्यु का वरदान?
भीष्म का असली नाम देवव्रत था. उनके पिता राजा शांतनु थे. हस्तिनापुर के राजा शांतनु को सत्यवती से प्रेम हो गया था. शांतनु ने सत्यवती से विवाह का प्रस्ताव रखा, लेकिन सत्यवती के पिता ने उनके सामने शर्त रखी कि सत्यवती का बेटा ही हस्तिनापुर का राजा होगा, न कि देवव्रत. देवव्रत उस समय हस्तिनापुर के उत्तराधिकारी थे.

भीष्म प्रतिज्ञा की वजह से राजा शांतनु ने उनको इच्छामृत्यु का वरदान दिया था.
इस शर्त से शांतनु धर्मसंकट में फंस गए. जब यह बात देवव्रत को पता चली तो उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने और विवाह न करने की प्रतिज्ञा ली, यही प्रतिज्ञा भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से प्रसिद्ध हुई और देवव्रत भीष्म के नाम से लोकप्रिय हुए. भीष्म की पितृ भक्ति से राजा शांतनु इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान दिया.
2026 में भीष्म अष्टमी कब है?
इस साल भीष्म अष्टमी 26 जनवरी दिन सोमवार को है. पंचांग के अनुसार, माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि 26 जनवरी को रात 9 बजकर 17 मिनट तक है. उदयातिथि के आधार पर भीष्म अष्टमी 26 जनवरी को मनाई जाएगी.


