मृत्यु के बाद आत्मा कब पहुंचती है यमलोक? मौत के बाद आखिर 13वें दिन ही क्यों होती है 13वीं?
Tehravin After Death: मृत्यु जीवन का ऐसा सच है जिससे कोई भी बच नहीं सकता, लेकिन हिंदू धर्म में मृत्यु को अंत नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरुआत माना गया है. यही वजह है कि किसी व्यक्ति के निधन के बाद कई धार्मिक परंपराएं निभाई जाती हैं. इनमें सबसे अहम मानी जाती है तेरहवीं. आपने भी कई बार देखा होगा कि परिवार 13 दिनों तक शोक में रहता है और 13वें दिन विशेष पूजा, पिंडदान और ब्राह्मण भोज जैसे कर्म किए जाते हैं. बहुत से लोगों के मन में सवाल उठता है कि आखिर यह रस्म 13वें दिन ही क्यों होती है? क्या इसके पीछे केवल परंपरा है या फिर शास्त्रों में इसका कोई विशेष महत्व भी बताया गया है?
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा और इन 13 दिनों के महत्व का विस्तार से उल्लेख मिलता है. आइए जानते हैं कि शास्त्रों के अनुसार इन 13 दिनों में आत्मा के साथ क्या होता है और तेरहवीं को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है.
मृत्यु के बाद आत्मा के बारे में क्या कहता है गरुड़ पुराण?
गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उसके प्राण शरीर से अलग हो जाते हैं. इसके बाद यमराज के दूत आत्मा को अपने साथ ले जाकर उसके जीवनभर के कर्मों का लेखा-जोखा दिखाते हैं. इसके बाद आत्मा को फिर उसी स्थान पर लौटाया जाता है, जहां उसने अंतिम सांस ली थी. मान्यता है कि मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा नया जन्म नहीं लेती. सांसारिक मोह, परिवार और अधूरे भावों के कारण वह करीब 13 दिनों तक अपने घर और परिजनों के आसपास रहती है. इस दौरान वह सब कुछ देख सकती है, लेकिन अपनी बात किसी तक पहुंचा नहीं पाती.
13 दिनों के कर्मकांड का क्या है महत्व?
शास्त्रों में इन 13 दिनों को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है. ऐसा माना जाता है कि परिवार की ओर से किए जाने वाले धार्मिक कर्म आत्मा की आगे की यात्रा को आसान बनाते हैं.
पहले 10 दिनों में बनता है सूक्ष्म शरीर
गरुड़ पुराण के अनुसार, मृत्यु के बाद पहले दस दिनों तक किए जाने वाले पिंडदान और तर्पण से आत्मा के नए सूक्ष्म शरीर का निर्माण शुरू होता है. हर दिन किए गए कर्मों का अपना अलग महत्व बताया गया है. मान्यता है कि धीरे-धीरे आत्मा के सूक्ष्म अंग तैयार होते हैं ताकि वह आगे की यात्रा कर सके.
11वें और 12वें दिन का महत्व
ग्यारहवें और बारहवें दिन किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों से आत्मा के सूक्ष्म शरीर को और मजबूती मिलती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय सूक्ष्म शरीर पर मांस और त्वचा का निर्माण पूरा होता है. इसलिए इन दिनों किए जाने वाले कर्मों को भी बेहद अहम माना गया है.
आखिर 13वें दिन ही क्यों होती है तेरहवीं?
तेरहवीं का दिन आत्मा की आगे की यात्रा के लिए सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किए गए विशेष पिंडदान और दान-पुण्य से आत्मा को यात्रा के लिए आवश्यक शक्ति और भोजन प्राप्त होता है. इसे ‘पाथेय’ कहा गया है. इसी कारण परिवार के लोग इस दिन विशेष पूजा-पाठ, ब्राह्मण भोजन और जरूरतमंदों को दान देकर मृत आत्मा की शांति की कामना करते हैं. मान्यता है कि इसके बाद आत्मा यमलोक की ओर अपनी यात्रा शुरू करती है.
यमलोक तक पहुंचने में कितना समय लगता है?
गरुड़ पुराण में उल्लेख मिलता है कि पृथ्वी लोक से यमलोक तक की दूरी लगभग 86,000 योजन बताई गई है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस यात्रा को पूरा करने में आत्मा को करीब एक वर्ष का समय लगता है. कहा जाता है कि तेरहवीं के दिन किया गया पिंडदान, तर्पण और दान-पुण्य इस पूरी यात्रा के दौरान आत्मा के लिए भोजन और जल का आधार बनता है. यही कारण है कि इन कर्मों को श्रद्धा और नियम के साथ करने की सलाह दी जाती है.
आज भी क्यों निभाई जाती है यह परंपरा?
समय के साथ जीवनशैली बदल गई है, लेकिन तेरहवीं की परंपरा आज भी लाखों हिंदू परिवारों में निभाई जाती है. कई लोग इसे धार्मिक आस्था से जोड़कर देखते हैं, जबकि कुछ इसे दिवंगत व्यक्ति के प्रति सम्मान और परिवार को मानसिक रूप से संभलने का अवसर भी मानते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि शोक के ये 13 दिन परिवार को भावनात्मक रूप से स्वीकार करने का समय देते हैं. वहीं धार्मिक आस्था रखने वाले लोगों के लिए यह आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना का माध्यम भी है. इसी वजह से यह परंपरा आज भी समाज में गहरी आस्था के साथ निभाई जाती है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


