मेहंदीपुर बालाजी से लेकर नैना देवी तक… भूलकर भी इन 5 मंदिरों का प्रसाद घर पर ना लाएं, ईश

मेहंदीपुर बालाजी से लेकर नैना देवी तक… भूलकर भी इन 5 मंदिरों का प्रसाद घर पर ना लाएं, ईश

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भूलकर भी इन 5 मंदिरों का प्रसाद ना लाएं, ईश्वरीय कृपा नहीं भूतों से होगा सामना

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भारत में मंदिर केवल पूजा स्थल ही नहीं हैं, बल्कि ऊर्जा और प्राचीन ज्ञान के केंद्र भी हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कुछ मंदिरों में प्रसाद घर ले जाना अशुभ माना जाता है? इन नियमों के पीछे आध्यात्मिक विज्ञान, पौराणिक कथाओं और ऊर्जा संबंधी मान्यताओं का एक दिलचस्प मिश्रण है. भक्तों को नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाने से लेकर देवता के अनुष्ठानों का सम्मान करने तक, प्रत्येक मंदिर का अपना एक अनूठा कारण है. आइए जानते हैं किन मंदिरों का प्रसाद घर पर नहीं लाना चाहिए…

भारत में मंदिर केवल धार्मिक या आध्यात्मिक स्थल ही नहीं हैं. कुछ भारतीय मंदिर अपने स्वर्णिम इतिहास, मनमोहक वास्तुकला और अनूठी परंपराओं के कारण दुनिया भर के यात्रियों को आकर्षित करते रहे हैं. जब भी घर से कोई तीर्थयात्रा या किसी मंदिर के दर्शन करने के लिए जाते हैं तो वह प्रियजनों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए भी प्रसाद ले लेते हैं, ताकि ईश्वर की कृपा सभी पर बनी रहे, यह लगभग एक रस्म ही बन गई है. चाहे तिरुपति के प्रसिद्ध लड्डू हों या पुरी का महाभोग, भक्त अक्सर इन पवित्र प्रसादों को दिव्य आशीर्वाद के प्रतीक के रूप में घर ले जाते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं भारत के कुछ ऐसे मंदिर भी हैं, जहां प्रसाद घर लाना तो दूर, उसको खाना भी नहीं चाहिए. अगर आप इन मंदिरों के प्रसाद को घर पर लाते हैं तो आप पर ईश्वर की कृपा नहीं बल्कि नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव बना रहेगा. आइए जानते हैं भक्तों को किन मंदिरों का प्रसाद नहीं खाना चाहिए.

मेहंदीपुर बालाजी मंदिर – मेहंदीपुर बालाजी आज भी भारत के सबसे रहस्यमय मंदिरों में से एक है. माना जाता है कि यहां आने वाले भक्तों को नकारात्मक ऊर्जाओं से मुक्ति मिलती है. यह मंदिर भगवान हनुमान के बाल स्वरूप को समर्पित है. मंदिर परिसर में प्रवेश करते ही आपको बुरी शक्तियों को दूर करने से संबंधित अनुष्ठान दिखाई देंगे. फिर आता है प्रसाद से जुड़ा सख्त रिवाज, जो पहली बार आने वाले अधिकांश लोगों को आश्चर्यचकित कर देता है. यहां भक्तों को प्रसाद या कोई भी खाद्य पदार्थ घर ले जाने की मनाही है. माना जाता है कि अनुष्ठानों के दौरान चढ़ाए गए प्रसाद अगर आप घर लेकर आते हैं तो नकारात्मक शक्तियां आपके घर तक आ सकती हैं. तीर्थयात्रियों को आमतौर पर प्रसाद को परिसर के भीतर ही ग्रहण करने या उसे वहीं छोड़ने के लिए कहा जाता है.

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कामाख्या मंदिर – कामाख्या मंदिर नीलाचल पहाड़ी की चोटी पर स्थित है, जहां से गुवाहाटी का मनोरम दृश्य दिखाई देता है. यह भारत के सबसे महत्वपूर्ण शक्तिपीठों में से एक है, जो तांत्रिक पूजा के लिए प्रसिद्ध है. यहां की रीतियां पारंपरिक हिंदू मंदिरों से भिन्न हैं. यहां वितरित किए जाने वाले कई प्रसाद मंदिर परिसर में ही ग्रहण करने के लिए होते हैं, विशेष रूप से प्रसिद्ध अंबुबाची मेले के दौरान, जब देवी का तीन दिवसीय मासिक धर्म चक्र चलता है. स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यह प्रसाद अत्यंत पवित्र होते हैं और इनमें अद्वितीय ऊर्जा होती है, इसलिए लोगों को कुछ पवित्र प्रसाद घर ले जाने से बचना चाहिए.

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कोटिलिंगेश्वर मंदिर, कर्नाटक – कोटिलिंगेश्वर मंदिर लाखों शिवलिंगों के लिए प्रसिद्ध है. यह भारत के सबसे अनूठे धार्मिक स्थलों में से एक है. लेकिन प्रसाद से संबंधित एक रोचक स्थानीय मान्यता है. मंदिर की परंपरा के अनुसार, यहां चढ़ाए गए प्रसाद पर भगवान शिव के परम भक्त चंडेश्वर का अधिकार होता है. इसी वजह से कई भक्त कोटिलिंगेश्वर मंदिर के प्रसाद को घर पर लेकर नहीं जाते क्योंकि वह ऐसा मानते हैं कि घर पर प्रसाद ले जाने से दुर्भाग्य आता है और कई तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं.

काल भैरव मंदिर, मध्य प्रदेश – प्राचीन शहर उज्जैन में स्थित काल भैरव मंदिर देश के सबसे रोचक धार्मिक स्थलों में से एक है. यह मंदिर भगवान शिव के उग्र रूप काल भैरव को समर्पित है और भक्त देवता को मदिरा चढ़ाते हैं, जो एक और अनूठी बात है. यह अनुष्ठान सदियों से तीर्थयात्रियों और जिज्ञासु यात्रियों को आकर्षित करता रहा है. लेकिन नए भक्त जो यहां दर्शन करने के लिए आते हैं, उनको यह नहीं पता कि काल भैरव को चढ़ाया गया प्रसाद आमतौर पर पारंपरिक मंदिर प्रसाद की तरह नहीं माना जाता है. स्थानीय परंपराओं के अनुसार, मदिरा और अन्य अनुष्ठानिक प्रसाद केवल देवता के लिए होते हैं और भक्त इन्हें घर वापस नहीं ले जाते हैं.

नैना देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश – शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में स्थित नैना देवी मंदिर का प्रसाद घर वापस ले जाना उचित नहीं है. शिवालिक पहाड़ियों में स्थित यह मंदिर भारत के शक्तिपीठों में से एक है. यह तीर्थस्थल कई स्थानीय रीति-रिवाजों से जुड़ा हुआ है, जिनमें से एक यह मान्यता है कि देवी को अर्पित की जाने वाली कुछ वस्तुएं यहीं रहनी चाहिए. यद्यपि प्रथाएं भिन्न-भिन्न हो सकती हैं, फिर भी कई लोग प्रसाद को घर ना ले जाने के पारंपरिक निर्देश का पालन करते हैं.

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