काशी में जब अष्टभैरव ने रोका हनुमानजी का रास्ता! फिर जो हुआ… देखकर कांप उठे थे सब

काशी में जब अष्टभैरव ने रोका हनुमानजी का रास्ता! फिर जो हुआ… देखकर कांप उठे थे सब

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काशी में जब अष्टभैरव ने रोका हनुमानजी का रास्ता! देखकर कांप उठे थे सभी देवता

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Hanuman ji And Bhairav ji Katha: काशी को भगवान शिव की अविनाशी नगरी कहा जाता है. मान्यता है कि यह केवल एक शहर नहीं बल्कि स्वयं महादेव का दिव्य धाम है, जहां हर दिशा की रक्षा अष्टभैरव करते हैं. पौराणिक परंपराओं के अनुसार, काशी में प्रवेश करने वाली प्रत्येक दिव्य शक्ति की परीक्षा लेना अष्टभैरव का दायित्व है. यही कारण है कि एक बार जब भगवान हनुमान काशी पहुंचे, तो अष्टभैरव ने उनका मार्ग रोक लिया. आखिर ऐसा क्यों हुआ? आइए जानते हैं इस रोचक कथा का रहस्य.

Hanuman ji And Bhairav ji Katha: भगवान शिव की नगरी काशी कोई साधारण नगर नहीं है, यह विश्व के सबसे प्राचीन और जीवंत शहरों में से एक है. इसे आध्यात्मिक राजधानी मोक्ष का द्वार मानी जाती है. इसे भगवान शिव की शाश्वत भूमि माना जाता है, जिसकी रक्षा अष्टभैरव नामक भयंकर दिव्य रक्षक करते हैं. कोई भी नकारात्मक शक्ति, राक्षस या अज्ञात ऊर्जा उनकी अनुमति के बिना इस पवित्र नगर में प्रवेश नहीं कर सकती. लेकिन फिर एक ऐसा क्षण आया जिसे देखकर सभी देवी-देवताओं भी स्तब्ध कर दिया. जब हनुमानजी काशी पहुंचे, तो कहा जाता है कि अष्टभैरवों ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया. इसके बाद जो हुआ वह इतना शक्तिशाली था कि पूरा नगर कांप उठा. हनुमानजी ने एक ऐसा दिव्य और भयानक रूप प्रकट किया कि शक्तिशाली भैरव भी मौन हो गए. आइए जानते हैं इस रोचक कथा का रहस्य.

काशी की रक्षा करते हैं अष्टभैरव – धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान भैरव को काशी का कोतवाल कहा जाता है. उनके आठ स्वरूप, जिन्हें अष्टभैरव कहा जाता है, काशी की आठों दिशाओं की रक्षा करते हैं. मान्यता है कि कोई भी देवता, दानव या अदृश्य शक्ति बिना उनकी अनुमति के इस पवित्र क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर सकती. यह व्यवस्था काशी की दिव्यता और मर्यादा की रक्षा के लिए मानी जाती है.

जब हनुमानजी पहुंचे काशी – लोककथाओं के अनुसार, लंका विजय के बाद हनुमानजी भगवान श्रीराम के आदेश से काशी नगरी भगवान विश्वनाथ के दर्शन के लिए पहुंचे. जैसे ही वे नगर की सीमा पर पहुंचे, अष्टभैरव उनके सामने प्रकट हुए और उनसे उनके आगमन का उद्देश्य पूछा. हनुमानजी ने विनम्रता से उत्तर दिया कि वे भगवान श्रीराम का संदेश लेकर आए हैं और भगवान विश्वनाथ के दर्शन करना चाहते हैं. लेकिन अष्टभैरव केवल शब्दों से संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने हनुमानजी की भक्ति, धैर्य और विनम्रता की परीक्षा लेने का निश्चय किया.

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हनुमानजी ने दिखाया अपना दिव्य स्वरूप – कुछ पौराणिक कथाओं में वर्णन मिलता है कि जब अष्टभैरव ने उन्हें आगे बढ़ने से रोका, तब हनुमानजी ने अपना विराट तेज प्रकट किया. हनुमानजी के दिव्य स्वरूप से चारों ओर अद्भुत ऊर्जा फैल गई. आकाश अंधकारमय हो गया, पृथ्वी कांप उठी और काशी का आध्यात्मिक कंपन तुरंत बदल गया. कथाओं के अनुसार, वातावरण इतना तीव्र हो गया था कि देवता भी मौन होकर यह सब देख रहे थे. हालांकि अधिकांश परंपराओं में इसे युद्ध नहीं, बल्कि दिव्य शक्तियों की पहचान और परीक्षा का प्रसंग माना गया है.

जब सामने आया सबसे बड़ा सत्य – कथा के अनुसार, अंततः अष्टभैरव को यह स्मरण हुआ कि भगवान हनुमान स्वयं भगवान शिव के रुद्रांश माने जाते हैं. इसलिए उनके और महादेव के बीच कोई भेद नहीं है. यह सत्य ज्ञात होते ही अष्टभैरव ने हनुमानजी का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उन्हें काशी में प्रवेश की अनुमति प्रदान की. अष्टभैरव की अनुमित के बाद हनुमानजी ने काशी विश्वनाथ के दर्शन किए और काशी में फिर से शांति हो गई. कुछ कथाओं में बताया जाता है कि हनुमानजी में ग्यारह भैरवों की संयुक्त शक्ति थी.
नोट: यह कथा विभिन्न लोकमान्यताओं और पौराणिक परंपराओं पर आधारित है. इस प्रसंग का विस्तृत उल्लेख सभी प्रमुख धर्मग्रंथों में समान रूप से नहीं मिलता, इसलिए विभिन्न क्षेत्रों में इसके अलग-अलग स्वरूप प्रचलित हैं.

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