आपने भी देखा होगा शव के नाक-कान में रुई, लेकिन क्या जानते हैं इसके पीछे का असली कारण?
Garuda Puran: मृत्यु जीवन का ऐसा सत्य है, जिसके बाद भी कई संस्कार और परंपराएं निभाई जाती हैं. हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार को केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि आत्मा की यात्रा से जुड़ा महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है. आपने कई बार देखा होगा कि किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसके शव के नाक और कान में रुई लगाई जाती है. यह दृश्य आम है, लेकिन इसके पीछे छिपे कारणों के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं.
क्या यह सिर्फ एक पुरानी परंपरा है या इसके पीछे धार्मिक विश्वास और वैज्ञानिक सोच भी जुड़ी हुई है? हिंदू धर्मग्रंथ गरुड़ पुराण में मृत्यु, आत्मा और अंतिम संस्कार से जुड़े कई नियमों का उल्लेख मिलता है. इन्हीं मान्यताओं में शव के कुछ अंगों को ढकने और सुरक्षित रखने की परंपरा भी बताई गई है.
अंतिम संस्कार और गरुड़ पुराण में बताए गए नियम
सनातन परंपरा में जीवन को 16 संस्कारों से जोड़ा गया है, जिनमें अंतिम संस्कार को विशेष स्थान दिया गया है. मान्यता है कि मृत्यु के बाद शरीर पंचतत्व में विलीन होता है और आत्मा अपनी आगे की यात्रा शुरू करती है. गरुड़ पुराण में मानव शरीर को नौ द्वारों वाला बताया गया है. इनमें दो आंखें, दो कान, दो नथुने, मुंह और शरीर के अन्य मार्ग शामिल हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद आत्मा शरीर का त्याग करती है और इन मार्गों का आध्यात्मिक महत्व माना जाता है.
नाक और कान में रुई लगाने की धार्मिक मान्यता
कई धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि मृत्यु के बाद शरीर के खुले अंगों को सुरक्षित रखना आवश्यक होता है. अंतिम संस्कार से पहले कई स्थानों पर मृतक के पास तुलसी के पत्ते या सोने जैसी पवित्र वस्तुएं रखने की परंपरा भी मिलती है. मान्यता है कि तुलसी को पवित्र और मोक्ष से जुड़ा माना जाता है, जबकि सोना शुद्धता और शुभता का प्रतीक माना जाता है. नाक और कान के छिद्रों में रुई लगाने से इन वस्तुओं के बाहर गिरने की संभावना कम होती है.
आत्मा की आगे की यात्रा से जुड़ा विश्वास
हिंदू मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के तुरंत बाद आत्मा का शरीर से मोह पूरी तरह समाप्त नहीं होता. कुछ धार्मिक कथाओं में कहा गया है कि आत्मा को अपने नए मार्ग की ओर बढ़ना होता है और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया इस यात्रा को सहज बनाने का माध्यम मानी जाती है. इसी विश्वास के कारण शरीर के खुले द्वारों को बंद करने की परंपरा विकसित हुई. हालांकि यह धार्मिक आस्था का विषय है और अलग-अलग समुदायों में इसकी मान्यताएं अलग हो सकती हैं.
नकारात्मक ऊर्जा से बचाव की मान्यता
पुरानी धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि मृत्यु के बाद शरीर निष्क्रिय हो जाता है और उसकी ऊर्जा समाप्त हो जाती है. ऐसे में शरीर की सुरक्षा के लिए कई प्रतीकात्मक उपाय किए जाते हैं. नाक और कान में रुई लगाना भी इन्हीं उपायों में से एक माना जाता है. इसे एक तरह का सुरक्षा प्रतीक माना गया, जो अशुभ प्रभावों से बचाने की धार्मिक कल्पना से जुड़ा है.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्या है कारण?
धार्मिक मान्यताओं के अलावा इसके पीछे व्यावहारिक कारण भी बताए जाते हैं. मृत्यु के बाद शरीर में प्राकृतिक रूप से बदलाव शुरू हो जाते हैं. शरीर में अपघटन की प्रक्रिया शुरू होने के कारण तरल पदार्थ बाहर निकल सकते हैं. नाक और कान जैसे खुले मार्गों में रुई लगाने से इन स्रावों को नियंत्रित करने में सहायता मिल सकती है. साथ ही शव को अंतिम संस्कार तक व्यवस्थित और सम्मानजनक स्थिति में रखने में भी मदद मिलती है. इसके अलावा शरीर में बनने वाली गैसों और बैक्टीरिया की गतिविधियों को देखते हुए भी पुराने समय में ऐसे उपाय अपनाए जाते थे. उस दौर में आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं सीमित थीं, इसलिए कई परंपराओं में धार्मिक विश्वासों के साथ व्यावहारिक अनुभव भी जुड़े हुए थे.
परंपरा और विज्ञान का मेल
भारत की कई परंपराएं ऐसी हैं जिनमें धार्मिक विश्वास और जीवन के व्यावहारिक अनुभव साथ-साथ दिखाई देते हैं. शव के नाक और कान में रुई लगाने की परंपरा भी ऐसी ही एक प्रथा है. जहां धार्मिक दृष्टि से इसे आत्मा की यात्रा और पवित्रता से जोड़ा जाता है, वहीं वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह शरीर को सुरक्षित और व्यवस्थित रखने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है.
अंतिम संस्कार से जुड़ी ये परंपराएं केवल रस्में नहीं हैं, बल्कि सदियों से चली आ रही मान्यताओं और अनुभवों का हिस्सा हैं.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


