Navratri में यहां तीन विशेष रूपों में होती है मां भगवती की पूजा, आदिवासियों की आराध्य देवी
Navratri में यहां तीन विशेष रूपों में होती है मां भगवती की पूजा, जानें रहस्य
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Sree Valliyoorkavu Bhagavathi Temple: चैत्र नवरात्रि का पर्व अपने मध्यकाल में पहुंच गया है, 26 मार्च को दुर्गा अष्टमी तो 27 मार्च को महानवमी का व्रत किया जाएगा. चैत्र नवरात्रि के मौके पर हम आपको ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां मां भगवती की तीन विशेष रूपों में पूजन होता है. नवरात्रि में 14 दिन के अनुष्ठान होते हैं और भक्तों की हर इच्छा पूरी होती है. आइए जानते हैं केरल के इस पवित्र मंदिर के बारे में…
Chaitra Navratri 2026: चैत्र नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है और घर-घर माता रानी की पूजा अर्चना की जा रही है. 26 मार्च को दुर्गा अष्टमी का व्रत किया जाएगा तो 27 मार्च को महानवमी के दिन कन्या पूजन करके नवरात्रि का समापन हो जाएगा. धार्मिक मान्यता है कि चैत्र नवरात्रि में की गई साधना, व्रत और पूजा से मां दुर्गा की विशेष कृपा प्राप्त होती है, कष्टों का निवारण होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है. भारत में मां भगवती के अनेक प्राचीन और प्रसिद्ध शक्तिपीठ, सिद्धपीठ और मंदिर स्थित हैं, जिनसे जुड़ी चमत्कारी कथाएं और आस्था की परंपराएं सदियों से लोगों के विश्वास को मजबूत करती आई हैं. आज हम आपको केरल के वायनाड में मां भगवती के ऐसे मंदिर के बारे में बताने दा रहे हैं, जहां तीन अद्भुत रूपों की माता रानी की पूजा अर्चना की जाती है.
तीन अद्भुत रूपों की होती है पूजा
केरल के वायनाड में मां भगवती के तीन अद्भुत रूपों की पूजा होती है, जिन्हें प्रकृति से जोड़कर देखा गया है. हम बात कर रहे हैं वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर की. हरी-भरी प्रकृति के मनमोहक दृश्यों के बीच वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर स्थापित है. दुनिया की पहुंच से दूर वल्लियूरक्कवु मंदिर में मां के तीन रूपों की पूजा होती है, जिसमें वन दुर्गा, भद्रकाली और जल दुर्गा मां शामिल हैं.
आदिवासी जनजातियों का स्थानीय मंदिर
वन दुर्गा और जल दुर्गा को प्रकृति का रूप माना जाता है, जबकि भद्रकाली को मां का सबसे उग्र रूप माना जाता है. खास बात यह है कि वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर वायनाड की आदिवासी जनजातियों का स्थानीय मंदिर है, जहां आज भी प्राचीन रीति-रिवाजों के साथ मां के तीनों रूपों की पूजा होती है. मंदिर के बनाव एतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ नहीं आता है. मंदिर का निर्माण पुराने झोपड़ीनुमा तरीके से किया गया है, जिस पर लकड़ी और फूस का इस्तेमाल किया गया है. माना जाता है कि मंदिर थिरुनेल्ली मंदिर के चार संरक्षक मंदिरों में से एक है और इसका निर्माण 14वीं शताब्दी में किया गया था.
नवरात्रि में चलता है 14 दिन का लंबा अनुष्ठान
मंदिर में चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान 14 दिन का लंबा अनुष्ठान चलता है जिसमें कलामेझुथु, ईडम कोरुम और सोपान नृत्यम किया जाता है. कलामेझुथु एक तरह की कला है, जो फर्श पर की जाती है. इसे धन और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है, जबकि ईडम कोरुम और सोपान नृत्यम एक तरह का पारंपरिक नृत्य होता है, जो मां भगवती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है. 14 दिन तक लगातार भक्त मंदिर में मां की आराधना में लीन रहते हैं और पारंपरिक नृत्य के जरिए मां के प्रति आस्था को दिखाते हैं.
हर मुराद यहां होती है पूरी
केरल के वायनाड जिले के मनंथावडी शहर से लगभग 3 किलोमीटर दूर वल्लियूरक्कवु भगवती मंदिर आम जनता की पहुंच से दूर है. आदिवासी-जनजातियों का मंदिर होने की वजह से मंदिर के बारे में स्थानीय लोगों को ही पता है. स्थानीय मान्यता है कि मां भगवती यहां वल्लियूरक्कु रूप में विराजमान हैं, जो स्वयं प्रकृति हैं. माना जाता है कि यहां मांगी गई हर मुराद मां पूरी करती है.
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पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें


