देश का एकमात्र 2000 साल पुराना मंदिर जहां पिंडी रूप में विराजमान शनि देव, शनि की साढ़ेसाती
देश का एकमात्र मंदिर जहां पिंडी रूप में शनि देव, देते हैं हर पीड़ा से मुक्ति
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Navagraha Shani Temple: आपने भारत में शनिदेव के मंदिरों में शनिदेव की प्रतिमा के दर्शन किए होंगे लेकिन उज्जैन में शनिदेव का एक ऐसा मंदिर हैं, जहां पिंडी स्वरूप में दर्शन दे रहे हैं. बताया जाता है कि यह देश का एकमात्र मंदिर है, जहां शनिदेव पिंडी रूप में विराजमान हैं और शनि की ढैय्या व साढ़ेसाती से मुक्ति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं. आइए जानते हैं शनिदेव के इस मंदिर के बारे में…
Navagraha Shani Temple: काशी के बाद उज्जैन ही ऐसा स्थान है, जहां जाने से केवल भगवान शिव की कृपा ही प्राप्त नहीं होती, बल्कि मां भगवती और शनि देव का आशीर्वाद भी मिलता है. बहुत कम लोग जानते हैं कि बाबा उज्जैन की धरती पर ऐसा शनि मंदिर मौजूद है, जहां शनि देव पिंडी के रूप में विराजमान हैं और उनकी प्रतिमा का रंग काला नहीं, बल्कि भगवा है. मंदिर की मान्यता इतनी पुरानी है कि भक्त अपने सारे कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मंदिर में दर्शन के लिए जरूर आते हैं. शनिदेव की ढैय्या व साढ़ेसाती के अशुभ प्रभाव को कम करने के लिए लोग यहां विशेष पूजा अर्चना करते हैं, जिसका शुभ फल प्राप्त होता है. आइए जानते हैं शनिदेव के इस मंदिर के बारे में…
2000 साल पुराना है शनिदेव का यह मंदिर
शिप्रा नदी के पास त्रिवेणी घाट के किनारे 2000 साल पुराना नवग्रह शनि मंदिर स्थापित है, जहां शनिदेव और नवग्रह दोनों का आशीर्वाद मिलता है. माना जाता है कि मंदिर में दर्शन करने से बड़ी से बड़ी समस्या का हल मिलता है. अगर नवग्रह असंतुलित हैं, तो यहां अनुष्ठान मात्र से सारी पीड़ा का अंत हो जाता है. शनिवार को पड़ने वाली अमावस्या के दिन मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, अगर भक्त किसी कष्ट से गुजर रहे हैं, तो वह मंदिर में ही चप्पल और वस्त्र छोड़ आते हैं. माना जाता है कि ऐसा करने से शारीरिक और मानसिक परेशानी से निजात मिलती है.
भगवा रंग की है शनिदेव की प्रतिमा
मंदिर में कई ऐसी अलग चीजें देखने को मिलती हैं, जो बाकी मंदिरों में देखने को नहीं मिलती. मंदिर में शनिदेव की मूर्ति काली नहीं, बल्कि भगवा रंग की है, जो देखने में हनुमान जी की प्रतिमा लगती है. वहीं मंदिर के मुख्य गर्भगृह में शनिदेव पिंडी रूप में विराजमान हैं और उन पर निरंतर तेल टपकता रहता है. शनिदेव के इस रूप को भगवान शिव का ही अवतार माना जाता है. कहा जाता है कि यह विश्व का पहला मंदिर है, जहां शनिदेव बाबा के रूप में विराजमान हैं.
शनिदोष से मिलती है मुक्ति
नवग्रह शनि मंदिर में दशा पूजन का बहुत महत्व है और भक्त देश के कोने-कोने से इस पूजन को कराने के लिए आते हैं. माना जाता है कि अगर किसी पर शनि की साढ़े साती या ढैय्या चल रही है, तो दशा पूजन बहुत लाभ देता है. इससे शनि देव की वक्र दृष्टि का प्रभाव कम होता है. साथ ही शनिदेव की कृपा से जीवन में सकारात्मकता आती है और धीरे-धीरे सभी परेशानियों से मुक्ति मिलती है.
राजा विक्रमादित्य ने कराया था मंदिर का निर्माण
मंदिर के इतिहास और बनावट की बात करें तो मंदिर बहुत छोटा है, लेकिन अब बाहर के हिस्से को शेड से कवर किया गया है. मंदिर के प्रांगण में पुराना पीपल का पेड़ मौजूद है, जहां मात्र धागा बांधने से मनोकामना पूरी होती है. माना जाता है कि मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने कराया था.
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पराग शर्मा एक अनुभवी धर्म एवं ज्योतिष पत्रकार हैं, जिन्हें भारतीय धार्मिक परंपराओं, ज्योतिष शास्त्र, मेदनी ज्योतिष, वैदिक शास्त्रों और ज्योतिषीय विज्ञान पर गहन अध्ययन और लेखन का 12+ वर्षों का व्यावहारिक अनुभव ह…और पढ़ें


