आज भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026: चंद्रोदय के बाद खुलेंगे व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व
Phalchandra Sankashti Chaturthi 2026: हिंदू धर्म में जब भी किसी नए काम की शुरुआत होती है, तो सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण किया जाता है. मान्यता है कि गणपति की कृपा से रास्ते की बाधाएं दूर हो जाती हैं और काम सफलता की ओर बढ़ता है. इसी आस्था से जुड़ा एक खास दिन है भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी, जो आज 6 मार्च 2026 को मनाई जा रही है. ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह दिन व्रत, साधना और चंद्र दर्शन का विशेष संयोग लेकर आता है. इस दिन भक्त पूरे दिन व्रत रखते हैं और रात में चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोलते हैं. कहा जाता है कि सच्चे मन से किया गया यह व्रत जीवन की रुकावटों को कम करता है, मानसिक शांति देता है और आर्थिक स्थिरता लाने में सहायक माना जाता है.
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी का ज्योतिषीय महत्व
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का संबंध चंद्रमा और गणेश ऊर्जा से माना जाता है. “भालचंद्र” नाम स्वयं संकेत देता है कि यह चंद्रमा से जुड़ा हुआ रूप है. कई प्राचीन चित्रों में भगवान गणेश के मस्तक पर चंद्रमा का चिह्न दर्शाया जाता है.
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जब चतुर्थी तिथि और चंद्र ऊर्जा का मेल होता है, तब मन और बुद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. यही कारण है कि इस दिन व्रत रखने और गणेश पूजा करने से मानसिक तनाव कम होने और निर्णय क्षमता बेहतर होने की बात कही जाती है.
भालचंद्र संकष्टी चतुर्थी 2026: तिथि और चंद्रोदय का समय
हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि आज 6 मार्च 2026 को मनाई जा रही है.
महत्वपूर्ण समय
-चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 6 मार्च 2026 शाम 7:53 बजे
-चतुर्थी तिथि समाप्त: 7 मार्च 2026 शाम 7:17 बजे
-चंद्रोदय का समय: रात लगभग 9:31 बजे
परंपरा के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद ही खोला जाता है. इसलिए भक्त रात में चंद्र दर्शन के बाद पूजा पूर्ण करते हैं.
पूजा विधि: सुबह से शुरू होती है तैयारी
संकष्टी चतुर्थी की पूजा बहुत जटिल नहीं होती, लेकिन इसे नियम और श्रद्धा के साथ किया जाता है.
सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनकर पूजा की तैयारी की जाती है. घर के मंदिर या साफ स्थान पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान गणेश की मूर्ति स्थापित की जाती है.
इसके बाद घी का दीपक जलाया जाता है और धूप अर्पित की जाती है. गंगाजल से अभिषेक करके गणेश जी को सिंदूर, अक्षत, पीले फूल और दूर्वा चढ़ाई जाती है. प्रसाद में मोदक या लड्डू अर्पित करना शुभ माना जाता है.
पूजा के दौरान भक्त “ॐ भालचंद्राय नमः” मंत्र का जाप करते हैं और संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा सुनते हैं.
चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद खुलता है व्रत
संकष्टी चतुर्थी का सबसे महत्वपूर्ण क्षण चंद्र दर्शन का होता है. रात में जब चंद्रमा दिखाई देता है, तब भक्त दूध और जल से अर्घ्य अर्पित करते हैं.
इसके बाद भगवान गणेश की आरती की जाती है और व्रत खोला जाता है. कई लोग इस समय परिवार के साथ प्रसाद बांटते हैं और गणपति से जीवन की समस्याएं दूर करने की प्रार्थना करते हैं.
क्यों खास माना जाता है यह व्रत
धार्मिक मान्यता के अनुसार संकष्टी चतुर्थी का व्रत जीवन की बाधाओं को कम करने वाला माना जाता है.
भक्तों का विश्वास है कि इस दिन गणेश पूजा करने से
-आर्थिक परेशानियां कम हो सकती हैं
-परिवार में शांति बनी रहती है
-कामकाज में आने वाली रुकावटें दूर होती हैं
-मानसिक संतुलन और आत्मविश्वास बढ़ता है
कई लोगों के लिए यह दिन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मविश्वास और आस्था का प्रतीक भी है.
(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)


