हिंदू देवी-देवताओं को कई हाथों के साथ क्यों दिखाया जाता है? जानें इसके पीछे का आध्यात्मिक

हिंदू देवी-देवताओं को कई हाथों के साथ क्यों दिखाया जाता है? जानें इसके पीछे का आध्यात्मिक

अगर आप कभी किसी मंदिर में हिंदू देवी-देवता के सामने खड़े हुए हैं या किसी चित्र में उन्हें देख रहे हैं तो सबसे पहले उनके दया भाव के साथ विशाल स्वरूप देखने को मिलता है. देवी-देवताओं के स्वरूप में उनके कई हाथ होते हैं, किसी के चार तो किसी के आठ… किसी के दस तो कभी-कभी इससे भी ज्यादा देखने को मिलते हैं. पहली नजर में यह सब काल्पनिक या रहस्यमय लग सकता है, यहां तक कि भ्रमित भी कर सकता है. लेकिन हिंदू दर्शन में पवित्र चित्रण में कुछ भी केवल सजावट के लिए नहीं होता. हर एक चीज का अर्थ होता है, हर परत में कोई ना कोई संदेश छुपा होता है. कई भुजाएं शारीरिक रूप को दिखाने के लिए नहीं होतीं. यह एक दृश्य भाषा है, जो उन गहरे सत्य को दर्शाती है जिन्हें शब्दों में कहना मुश्किल है.

कई हाथ प्रतीकात्मक भाषा का हिस्सा
हिंदू आध्यात्मिक परंपरा हमेशा से मानती आई है कि दिव्यता को केवल शब्दों से पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता. प्रतीक दृश्य और अदृश्य के बीच सेतु बन जाते हैं. देवी-देवताओं के कई हाथ इसी प्रतीकात्मक भाषा का हिस्सा हैं. आपने देखा होगा कि देवी-देवता कई स्वरूप भी बदल लेते हैं, कभी किसी स्वरूप में नजर आते हैं तो कभी दूसरे स्वरूप में. भारतीय धर्म शास्त्रों में ईश्वर को एक ऊर्जा बताया गया है, जो कोई भी और कैसा भी स्वरूप धारण कर सकती है. सारे स्वरूप उनके हैं और उस ऊर्जा का कोई स्वरूप भी नहीं है.

मां दुर्गा के कई हाथ
हिंदू चित्रकला में कई हाथ शक्ति के प्रतीक हैं. दो भुजाओं वाला व्यक्ति एक समय में दो काम कर सकता है. वहीं कई भुजाओं वाला एक साथ कई स्तरों पर काम कर सकता है. इसीलिए सुरक्षा और संतुलन से जुड़े देवी-देवताओं को अक्सर कई हाथों के साथ दिखाया जाता है. उदाहरण के लिए, मां दुर्गा को आठ या दस भुजाओं के साथ दिखाया जाता है, मां के हर हाथ में एक शस्त्र मौजूद रहता है. माता के कई हाथ और उनमें शस्त्र आक्रामकता का नहीं, बल्कि पूर्णता का प्रतीक हैं. हर शस्त्र एक अलग आंतरिक शक्ति, साहस, स्पष्टता, विवेक, धैर्य और संकल्प का प्रतीक है.

देवी-देवताओं के कई हाथों से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हर हाथ में क्या है?
जैसे भगवान विष्णु को ज्यादातर चार भुजाओं के साथ दिखाया जाता है. उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और कमल होता है. ये सामान्य अर्थ में शस्त्र नहीं हैं. ये विचारों को दृश्य रूप में दिखाते हैं. चार भुजाएं, चार दिशाएं, अस्तित्व के चार आयाम हैं और भगवान विष्णु संतुलन का जीवंत मानचित्र बन जाते हैं.

  • शंख पवित्र ध्वनि और जागरण का प्रतीक है.
  • चक्र मन और ब्रह्मांडीय व्यवस्था का प्रतीक है.
  • गदा शक्ति और अनुशासन का प्रतीक है.
  • कमल सांसारिक अराजकता में भी पवित्रता का प्रतीक है.

समय से परे, सीमाओं से परे
एक और कारण कि देवी-देवताओं को कई भुजाओं के साथ दिखाया जाता है, वह है समय से परे होने का संकेत देना. इंसान एक समय में एक ही काम करता है. दिव्यता को एक साथ कई कार्य करते हुए दिखाया जाता है. शिव को नटराज के रूप में दिखाते समय, उनकी अलग-अलग भुजाएं एक साथ सृजन, विनाश, सुरक्षा और मुक्ति का कार्य करती हैं. सृजन के बाद विनाश नहीं होता, दोनों एक साथ होते हैं. यह एक गहरा दार्शनिक विचार है, जिसे रूप और गति के माध्यम से व्यक्त किया गया है. भुजाएं दिखाती हैं कि वास्तविकता रेखीय नहीं, बल्कि लयबद्ध है.

आज भी यह चित्रण क्यों रखता है मायने
आज के यथार्थवादी युग में प्रतीकों की भाषा लगभग खो गई है. हिंदू चित्रण हमें तर्क से नहीं, अंतर्ज्ञान से पढ़ने के लिए कहता है. अतिरिक्त भुजाएं सचमुच में मानने के लिए नहीं, भीतर से समझने के लिए हैं. वे याद दिलाती हैं कि दिव्यता नाजुक या सीमित नहीं है. वह विशाल, उत्तरदायी और पूरी तरह सक्षम है. जब चेतना संतुलित होती है, तो कोई भी स्थिति बहुत जटिल नहीं, कोई भी चुनौती बहुत बड़ी नहीं. जो पहली नजर में अलौकिक लगता है, वह वास्तव में गहराई से मनोवैज्ञानिक और अत्यंत व्यावहारिक है. देवी-देवताओं के पास हमसे ज्यादा भुजाएं नहीं हैं. वे दिखाते हैं कि जब चेतना अपनी पूरी क्षमता को याद करती है तो क्या संभव है.

Source link

You May Have Missed