हाई वोलैटिलिटी का काउंटडाउन शुरू? मंगल-राहु की युति से बढ़ेगी बाजार की धड़कन, आज से 40 दिन बाजार में हाई-रिस्क अलर्ट

हाई वोलैटिलिटी का काउंटडाउन शुरू? मंगल-राहु की युति से बढ़ेगी बाजार की धड़कन, आज से 40 दिन बाजार में हाई-रिस्क अलर्ट

Mangal Rahu Yuti 2026: फरवरी का आखिरी सप्ताह अक्सर बजट, वैश्विक संकेतों और तिमाही नतीजों की चर्चा में गुजरता है. लेकिन इस बार बातचीत का एक और कारण है. 23 फरवरी 2026 से बनने जा रही मंगल-राहु युति को लेकर ज्योतिष जगत में असामान्य हलचल है. शेयर बाजार पहले ही उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है, सोना-चांदी नई ऊंचाइयों और अचानक गिरावट के बीच झूल रहे हैं. ऐसे में यह दावा कि अगले 40 दिन “हाई-रिस्क फेज” हो सकते हैं, निवेशकों को चौकन्ना कर रहा है. दिलचस्प यह है कि यह चर्चा सिर्फ आस्था तक सीमित नहीं है. कई ट्रेडर्स और छोटे निवेशक भी मानते हैं कि जब अनिश्चितता बढ़ती है तो बाजार की चाल ज्यादा भावनात्मक हो जाती है. यही वह समय होता है जब डर और लालच, दोनों अपने चरम पर दिखाई देते हैं.

23 फरवरी क्यों माना जा रहा है संवेदनशील दिन?
ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 23 फरवरी 2026 की सुबह मंगल का गोचर कुंभ राशि में होगा, जहां पहले से राहु स्थित है. इस संयोग को अंगारक योग भी कहा जाता है. मंगल ऊर्जा, आक्रामकता और त्वरित निर्णय का कारक है, जबकि राहु भ्रम, अचानक घटनाओं और अप्रत्याशित मोड़ों से जुड़ा माना जाता है.

जब ये दोनों एक साथ आते हैं तो अस्थिरता की आशंका जताई जाती है. खासतौर पर तब, जब वैश्विक हालात पहले से तनावपूर्ण हों. पिछले कुछ वर्षों में हमने देखा है कि भू-राजनीतिक घटनाएं कैसे एक दिन में बाजार की दिशा बदल देती हैं. ऐसे में 23 फरवरी से 2 अप्रैल 2026 तक का समय कई ज्योतिषियों की नजर में संवेदनशील है.

इतिहास में अंगारक योग और बाजार
यह पहली बार नहीं है जब इस तरह की युति चर्चा में आई हो. पूर्व के कुछ संयोगों के दौरान वैश्विक स्तर पर राजनीतिक फैसले, अचानक सैन्य गतिविधियां या आर्थिक झटके देखने को मिले थे. हालांकि हर बार परिणाम एक जैसे नहीं रहे, लेकिन अस्थिरता का तत्व जरूर प्रमुख रहा. बाजार विशेषज्ञ मानते हैं कि ज्योतिषीय संकेतों से ज्यादा महत्वपूर्ण है निवेशकों की मानसिकता. अगर बड़ी संख्या में लोग किसी संभावित जोखिम को मान लेते हैं, तो उसका असर व्यवहार में भी दिख सकता है.

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शेयर बाजार में तेज उतार-चढ़ाव की आशंका
विश्लेषकों का कहना है कि इस अवधि में शेयर बाजार में वोलैटिलिटी बढ़ सकती है. अचानक गिरावट या अप्रत्याशित तेजी, दोनों ही संभावनाएं बन सकती हैं. खासकर टेक्नोलॉजी, डिफेंस और एनर्जी सेक्टर में ज्यादा हलचल देखी जा सकती है.

हाल के महीनों में विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक संकेतों ने बाजार को संवेदनशील बना रखा है. अगर इसी दौरान कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम जुड़ जाता है, तो गिरावट गहरी हो सकती है. वहीं सकारात्मक खबर आने पर तेज रिकवरी भी संभव है.

छोटे निवेशकों के लिए यह समय धैर्य की परीक्षा जैसा हो सकता है. अनुभवी ट्रेडर्स अक्सर कहते हैं कि “वोलैटिलिटी ही अवसर है”, लेकिन बिना रणनीति के कदम उठाना भारी पड़ सकता है.

सोना-चांदी में सेफ हेवन रैली?
जब भी बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है, निवेशक सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं. सोना और चांदी पारंपरिक रूप से सेफ हेवन माने जाते हैं. 23 फरवरी के बाद यदि भू-राजनीतिक तनाव या आर्थिक दबाव बढ़ता है, तो कीमती धातुओं में तेज उछाल देखने को मिल सकता है.

हालांकि इसमें भी उतार-चढ़ाव रहेगा. रुपये-डॉलर विनिमय दर, वैश्विक ब्याज दरें और केंद्रीय बैंकों की नीतियां कीमतों को प्रभावित करेंगी. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह अवधि शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स के लिए अवसर ला सकती है, जबकि लॉन्ग टर्म निवेशकों को संतुलन बनाए रखना चाहिए.

वैश्विक राजनीति पर संभावित असर
मंगल-राहु का संयोग अक्सर आक्रामक फैसलों और कूटनीतिक तनाव से जोड़ा जाता है. अमेरिका, यूरोप, रूस और चीन जैसे बड़े शक्ति केंद्रों के बीच नीति बदलाव या कड़े बयानबाजी का दौर तेज हो सकता है. चुनावी माहौल वाले देशों में राजनीतिक उथल-पुथल भी देखने को मिल सकती है.

हालांकि यह भी सच है कि ज्योतिषीय संकेत संभावनाएं बताते हैं, निश्चित परिणाम नहीं. वास्तविक घटनाएं आर्थिक आंकड़ों, रणनीतिक हितों और नेतृत्व के फैसलों पर निर्भर करती हैं.

निवेशकों के लिए क्या है संदेश?
सबसे अहम बात घबराहट से बचना है. भावनाओं में लिया गया निर्णय अक्सर नुकसान बढ़ा देता है. इस अवधि में पोर्टफोलियो का विविधीकरण, जोखिम प्रबंधन और विश्वसनीय सलाहकार की राय महत्वपूर्ण हो जाती है. सोना-चांदी को हेजिंग टूल की तरह देखा जा सकता है, लेकिन अंधाधुंध निवेश से बचना चाहिए. सोशल मीडिया पर फैलने वाली अफवाहों से दूरी रखना भी जरूरी है.

अंततः बाजार की दिशा सिर्फ ग्रहों से तय नहीं होती. ब्याज दरें, महंगाई, GDP आंकड़े और वैश्विक नीतियां भी उतनी ही निर्णायक भूमिका निभाती हैं. फिर भी, जब अनिश्चितता बढ़े तो सतर्क रहना ही समझदारी है.

(Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारियां और सूचनाएं सामान्य मान्यताओं पर आधारित हैं. Hindi news18 इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से संपर्क करें.)

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